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सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के 25 साल पुराने जमीन विवाद में FIR रद्द की, कहा- सिविल विवादों में आपराधिक कानून का दुरुपयोग नहीं हो सकता

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सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के एक पुराने जमीन विवाद में दर्ज FIR रद्द करते हुए कहा कि सिविल प्रॉपर्टी विवाद को आपराधिक रंग देकर दबाव बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। - भीखुभाई गोविंदभाई पटेल एवं अन्य बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य।

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के 25 साल पुराने जमीन विवाद में FIR रद्द की, कहा- सिविल विवादों में आपराधिक कानून का दुरुपयोग नहीं हो सकता

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के एक लंबे समय से चल रहे जमीन विवाद में दर्ज आपराधिक मामला रद्द करते हुए कहा है कि सिविल संपत्ति विवादों में आपराधिक कानून को “दबाव और उत्पीड़न के हथियार” के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें धोखाधड़ी, जालसाजी, रंगदारी और आपराधिक साजिश से जुड़े FIR को रद्द करने से इनकार किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद सूरत के गांव पानस स्थित सर्वे नंबर 157 की जमीन से जुड़ा था। रिकॉर्ड के अनुसार, यह जमीन 1957 में परिवार के सदस्यों द्वारा संयुक्त रूप से खरीदी गई थी। बाद में जमीन के स्वामित्व को लेकर कई सिविल मुकदमे और राजस्व कार्यवाही चलीं।

अपीलकर्ताओं ने वर्ष 2000 में सिविल मुकदमा दायर कर जमीन में अपने हिस्से का दावा किया था। इस दौरान सिविल अदालतों से अंतरिम राहत भी मिली थी।

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इसके बावजूद 2009 में एक FIR दर्ज की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि विवादित जमीन से जुड़े दस्तावेजों और पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिए धोखाधड़ी और जालसाजी की गई।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई वर्षों तक चले सिविल मुकदमों के दौरान शिकायतकर्ता ने कभी रंगदारी, धमकी या आपराधिक साजिश के आरोप नहीं लगाए थे।

पीठ ने यह भी नोट किया कि मई 2009 में दी गई पहली शिकायत में रंगदारी या पैसों की मांग का कोई आरोप नहीं था। ये आरोप पहली बार दिसंबर 2009 की FIR में जोड़े गए।

अदालत ने कहा,

“बाद में जोड़े गए रंगदारी और धमकी के आरोप विवाद की प्रकृति को पूरी तरह बदल देते हैं और यह दिखाते हैं कि सिविल विवाद को आपराधिक रंग देने की कोशिश की गई।”

कोर्ट ने FIR दर्ज करने में करीब आठ से नौ साल की देरी पर भी सवाल उठाया। पीठ ने कहा कि देरी के लिए दिया गया स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं है, खासकर तब जब शिकायतकर्ता उसी अवधि में लगातार सिविल अदालतों में मुकदमे लड़ रहा था।

जालसाजी के आरोपों पर अदालत ने कहा कि केवल किसी संपत्ति पर स्वामित्व का दावा करना “फर्जी दस्तावेज” तैयार करने के बराबर नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई आरोप नहीं है कि पावर ऑफ अटॉर्नी पर हस्ताक्षर नकली थे या किसी ने किसी और का रूप धारण किया था।

पीठ ने आगे कहा कि धोखाधड़ी और रंगदारी के अपराधों के जरूरी तत्व भी FIR में मौजूद नहीं हैं।

अदालत ने स्पष्ट कहा,

“आपराधिक प्रक्रिया को संपत्ति विवादों में उत्पीड़न और दबाव का हथियार बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह मामला उन श्रेणियों में आता है जहां दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत हस्तक्षेप कर कार्यवाही रद्द की जा सकती है।

इसके साथ ही अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट का 2023 का आदेश रद्द कर दिया और उमरा पुलिस स्टेशन, सूरत में दर्ज FIR तथा उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को अपीलकर्ताओं के खिलाफ समाप्त कर दिया।

हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस फैसले का असर जमीन के स्वामित्व और टाइटल से जुड़े लंबित सिविल मुकदमों पर नहीं पड़ेगा।

Case Details

Case Title: Bhikhubhai Govindbhai Patel & Anr. v. The State of Gujarat & Anr.

Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 15537 of 2023 and SLP (Crl.) No. 16049 of 2023

Judge: Justice Sanjay Karol and Justice Vipul M. Pancholi

Decision Date: 22 May 2026

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