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अनुच्छेद 161 के तहत बनी रिमिशन नीति को CrPC के तहत बनी वैधानिक नीति से खत्म नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

CB News Desk
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सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि 2008 की पॉलिसी के बावजूद, आर्टिकल 161 के तहत हरियाणा की 2002 की सज़ा में छूट (रेमिशन) देने वाली पॉलिसी लागू रहेगी। कोर्ट ने राज्य को उम्रकैद की सज़ा काट रहे एक कैदी की सज़ा में छूट की अर्ज़ी पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया। - परवीन कुमार उर्फ़ परवीन चौहान बनाम हरियाणा राज्य व अन्य।

अनुच्छेद 161 के तहत बनी रिमिशन नीति को CrPC के तहत बनी वैधानिक नीति से खत्म नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार की रिमिशन (समय से पहले रिहाई) नीति को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत बनाई गई रिमिशन नीति को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत बनाई गई बाद की वैधानिक नीति से समाप्त या अप्रभावी नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल की संवैधानिक शक्ति, वैधानिक शक्ति से अलग और स्वतंत्र है।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमीकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने परवीन कुमार @ परवीन चौहान बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य मामले में यह फैसला सुनाया। साथ ही, हरियाणा सरकार को याचिकाकर्ता की रिमिशन अर्जी पर 2002 की नीति के अनुसार चार सप्ताह के भीतर नया निर्णय लेने का निर्देश दिया।

क्या था मामला?

याचिकाकर्ता को वर्ष 2007 में हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। उसने वर्ष 2022 में 14 वर्ष से अधिक वास्तविक सजा पूरी करने के बाद हरियाणा की 12 अप्रैल 2002 की रिमिशन नीति के तहत समय से पहले रिहाई की मांग की।

हालांकि, राज्य सरकार ने यह कहते हुए उसका आवेदन खारिज कर दिया कि उसके मामले पर 13 अगस्त 2008 की नई रिमिशन नीति लागू होगी, जिसके तहत वह आवश्यक अवधि की सजा पूरी नहीं कर पाया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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पीठ ने 2002 और 2008 की दोनों नीतियों का विस्तृत अध्ययन किया। अदालत ने पाया कि 2002 की नीति स्पष्ट रूप से संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल द्वारा रिमिशन देने की शक्ति पर आधारित थी, जबकि 2008 की नीति CrPC की धारा 432 और 433 के तहत बनाई गई वैधानिक नीति थी।

अदालत ने कहा,

"अनुच्छेद 161 के तहत प्रयोग की गई संवैधानिक शक्ति, किसी भी वैधानिक शक्ति से स्वतंत्र है। इसलिए कोई वैधानिक नीति संवैधानिक शक्ति के प्रयोग को समाप्त नहीं कर सकती।"

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों हरियाणा राज्य बनाम जगदीश और हरियाणा राज्य बनाम राज कुमार का भी विश्लेषण किया।

अदालत ने कहा कि तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दिए गए जगदीश फैसले में स्पष्ट किया गया था कि 1993 की रिमिशन नीति अनुच्छेद 161 के तहत बनी थी। चूंकि 2002 की नीति भी उसी प्रकार की थी, इसलिए उसे भी संवैधानिक नीति माना जाना चाहिए।

पीठ ने माना कि राज कुमार मामले में 2002 की नीति को केवल वैधानिक नीति मानना बड़े पीठ के फैसले के विपरीत था। इसलिए उस निर्णय का वह हिस्सा 'पर इनक्यूरियम' (Per Incuriam) माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता का मामला 2002 की रिमिशन नीति के अनुसार ही विचार योग्य है। इसलिए वह उस नीति के तहत मिलने वाले लाभ का दावा कर सकता है।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला भावी (Prospective) रूप से लागू होगा और इससे पहले जिन रिमिशन आवेदनों पर अंतिम निर्णय हो चुका है, वे दोबारा नहीं खोले जाएंगे।

अंत में अदालत ने हरियाणा सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता की रिमिशन अर्जी पर इस फैसले के अनुरूप चार सप्ताह के भीतर नया निर्णय ले।

इसके साथ ही अपील स्वीकार कर ली गई।

Case Details

Case Title: Parveen Kumar @ Parveen Chauhan v. State of Haryana & Ors.

Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Criminal) No. 9920 of 2026

Judges: Justice Sanjay Karol and Justice Nongmeikapam Kotiswar Singh

Decision Date: July 1, 2026

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