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पैदल चलना मौलिक अधिकार, फ़ुटपाथ उपलब्ध कराना सरकारों का कर्तव्य; बच्चे की मौत मामले में मुआवज़ा बढ़ाया: सुप्रीम कोर्ट

Zaved Khan
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पैदल चलना और सुरक्षित फुटपाथों तक पहुंच संविधान के तहत मौलिक अधिकार है। अदालत ने बच्चे की सड़क दुर्घटना मृत्यु मामले में मुआवजा भी बढ़ाया। - मनियार इलियाज़ @ शेख रियाज़ और अन्य। बनाम पी. अय्यप्पन और अन्य।

पैदल चलना मौलिक अधिकार, फ़ुटपाथ उपलब्ध कराना सरकारों का कर्तव्य; बच्चे की मौत मामले में मुआवज़ा बढ़ाया: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पैदल चलना केवल एक सामान्य गतिविधि नहीं, बल्कि संविधान द्वारा संरक्षित मौलिक अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नागरिकों को सुरक्षित और चिन्हित फुटपाथों पर चलने का अधिकार प्राप्त है और यह अधिकार मोटर वाहनों की आवाजाही पर प्राथमिकता रखता है।

यह फैसला एक सड़क दुर्घटना से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें स्कूल जा रहे पांच वर्षीय बच्चे की टैंकर की चपेट में आने से मृत्यु हो गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले के अनुसार, अपीलकर्ता अपने पांच वर्षीय बेटे को स्कूल छोड़ने जा रहे थे। रास्ते में पीछे से आए एक टैंकर ने बच्चे को टक्कर मार दी, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।

दुर्घटना के बाद परिवार ने मुआवजे की मांग करते हुए दावा याचिका दायर की थी। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) ने परिवार को 7.82 लाख रुपये का मुआवजा दिया था। बाद में हाई कोर्ट ने इस राशि को घटाकर 4.70 लाख रुपये कर दिया। इसके खिलाफ बच्चे के पिता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

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न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पैदल यात्रियों के अधिकारों पर विस्तार से विचार किया।

पीठ ने कहा, “अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत आवागमन की स्वतंत्रता का प्राथमिक स्वरूप पैदल चलने का अधिकार है।”

अदालत ने कहा कि जीवन के अधिकार और स्वतंत्र आवागमन के अधिकार का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होता है जब नागरिकों को सुरक्षित फुटपाथ उपलब्ध हों। केवल सड़क बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके साथ पैदल यात्रियों के लिए उचित व्यवस्था भी आवश्यक है।

पीठ ने यह भी कहा कि “यदि सड़क मौजूद है, तो पैदल यात्रियों के लिए चिन्हित और सुव्यवस्थित फुटपाथ उपलब्ध कराना संबंधित प्राधिकरणों का कर्तव्य है।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शहरी विकास प्राधिकरण, नगर निगम, नगरपालिकाएं और पंचायतें पैदल यात्रियों के अधिकारों की संरक्षक हैं। इन संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे फुटपाथों का निर्माण करें, उनका रखरखाव करें और उन्हें अतिक्रमण या अन्य बाधाओं से सुरक्षित रखें।

अदालत ने यह भी माना कि वर्तमान में ऐसा कोई व्यापक कानून नहीं है जो पैदल चलने के अधिकार को स्पष्ट रूप से लागू करता हो। इसलिए केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालयों को इस विषय पर विधायी ढांचा तैयार करने पर विचार करना चाहिए।

मुआवजे के प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट द्वारा राशि कम करना उचित नहीं था। अदालत ने अपने हालिया फैसलों में निर्धारित सिद्धांतों को लागू करते हुए मुआवजे की पुनर्गणना की।

इसके बाद मृतक बच्चे के परिवार को कुल 11,44,628 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया गया। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि दो महीने के भीतर अदा की जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने घोषणा की कि पैदल चलने का अधिकार संविधान के भाग-III के अंतर्गत एक मौलिक अधिकार है और इसमें सुरक्षित एवं चिन्हित फुटपाथों तक पहुंच का अधिकार भी शामिल है। अदालत ने कहा कि फुटपाथ उपलब्ध कराना और उनका रखरखाव करना स्थानीय एवं शहरी निकायों का कानूनी दायित्व है। साथ ही, यदि इस अधिकार का उल्लंघन होता है तो नागरिक संवैधानिक और अन्य कानूनी उपचार प्राप्त करने के हकदार होंगे।

इसी के साथ अदालत ने अपीलों का निस्तारण कर दिया।

Case Details:

Case Title: Maniyar Iliyaz @ Shaik Riyaz & Anr. v. P. Ayyappan & Ors.

Case Number: Civil Appeal Nos. 4665-4666 of 2025

Judges: Justice Pamidighantam Sri Narasimha and Justice Atul S. Chandurkar

Decision Date: June 19, 2026

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