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सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा पत्नी का गुजारा भत्ता दोगुना किया, कहा- सम्मान की ज़िंदगी कोई एहसान नहीं

Shivam
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अनामिका जैन बनाम डॉ. अतुल जैन - सुप्रीम कोर्ट ने अनामिका जैन मामले में स्थायी गुजारा भत्ता बढ़ाकर ₹30,000 कर दिया है और कहा है कि तलाक के बाद भरण-पोषण से केवल जीवनयापन ही नहीं, बल्कि गरिमा सुनिश्चित होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा पत्नी का गुजारा भत्ता दोगुना किया, कहा- सम्मान की ज़िंदगी कोई एहसान नहीं

नई दिल्ली में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट की अदालत में एक घरेलू विवाद से जुड़ा मामला सुना गया, लेकिन फैसला सिर्फ दो लोगों तक सीमित नहीं रहा। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि तलाक के बाद भी पत्नी को गरिमा के साथ जीने का अधिकार है। इसी सोच के साथ कोर्ट ने पत्नी को मिलने वाली स्थायी गुजारा भत्ता (परमानेंट एलिमनी) की रकम 15,000 रुपये से बढ़ाकर 30,000 रुपये प्रति माह कर दी।

यह मामला अनामिका जैन बनाम डॉ. अतुल जैन से जुड़ा है, जिसमें पत्नी ने भत्ते की राशि कम होने पर चुनौती दी थी।

केस की पृष्ठभूमि

दोनों की शादी 13 नवंबर 1994 को हुई थी। इस विवाह से एक बेटा हुआ, जिसका जन्म 1997 में हुआ। समय के साथ रिश्ते बिगड़ते गए और साल 2011 से दोनों अलग रहने लगे। इसके बाद पति ने हिंदू मैरिज एक्ट के तहत तलाक की अर्जी दी।

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फैमिली कोर्ट, भोपाल ने तलाक की डिक्री देते हुए पत्नी को 15,000 रुपये प्रति माह और 50,000 रुपये एकमुश्त देने का आदेश दिया। पत्नी ने इसे कम बताते हुए हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिली। आखिरकार वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं

पत्नी की ओर से दलील दी गई कि पति पेशे से डॉक्टर हैं और उनकी आमदनी अच्छी है। साथ ही, उनकी निजी प्रैक्टिस और किराये की आय भी है। वकील ने कहा कि इतने संसाधनों के बावजूद 15,000 रुपये महीना “आज के समय में नाकाफी” है।

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वहीं पति की ओर से कहा गया कि पत्नी पढ़ी-लिखी हैं और खुद कमा सकती हैं। यह भी तर्क दिया गया कि वह बेटे की पढ़ाई का खर्च उठा रहे हैं और उनकी दूसरी शादी भी असफल हो चुकी है।

कोर्ट की अहम टिप्पणी

जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने मामले को व्यावहारिक नजर से देखा। अदालत ने कहा कि शादी सिर्फ एक कानूनी रिश्ता नहीं, बल्कि भरोसे और साथ की जिम्मेदारी भी होती है।

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बेंच ने टिप्पणी की,

“तलाक के बाद भी पत्नी का यह हक खत्म नहीं हो जाता कि वह उसी स्तर की जिंदगी जिए, जिसकी वह शादी के दौरान आदी थी।” कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि सिर्फ यह कहना कि पत्नी पढ़ी-लिखी है, उसे सम्मानजनक भत्ता न देने का बहाना नहीं बन सकता।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 15,000 रुपये प्रति माह आज की महंगाई और हालात को देखते हुए कम हैं। दोनों पक्षों से चर्चा के बाद अदालत ने भत्ता बढ़ाकर 30,000 रुपये प्रति माह कर दिया। यह राशि पत्नी को जुलाई 2021 से देय होगी।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि पिछली बकाया रकम या तो एक साथ या किस्तों में चुकाई जाए। इसी के साथ फैमिली कोर्ट और हाईकोर्ट के पुराने आदेश में संशोधन करते हुए अपील मंजूर कर ली गई।

Case Title:- Anamika Jain vs Dr. Atul Jain

Case Number:- Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 5220 of 2024

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