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उत्तराखंड बलात्कार-हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दो लोगों को बरी किया, कमजोर परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर मौत की सजा रद्द की।

CB News Desk
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सुप्रीम कोर्ट ने 2012 के उत्तराखंड रेप-मर्डर केस में दोषी ठहराए गए दो आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी और विश्वसनीय कड़ी साबित नहीं कर सका। - मेहताब बनाम उत्तराखंड राज्य

उत्तराखंड बलात्कार-हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दो लोगों को बरी किया, कमजोर परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर मौत की सजा रद्द की।

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2012 के चर्चित उत्तराखंड रेप और हत्या मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दो आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की ऐसी पूर्ण श्रृंखला स्थापित नहीं कर सका, जिससे अपराध केवल उन्हीं के द्वारा किया गया साबित हो सके।

न्यायमूर्ति संदीप मेहता, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने ट्रायल कोर्ट और उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसलों को पलटते हुए कहा कि जांच में गंभीर खामियां थीं और कई महत्वपूर्ण परिस्थितियां संदेह से परे साबित नहीं की जा सकीं।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन के अनुसार, 29 दिसंबर 2012 को 55 वर्षीय महिला जंगल में बकरियां चराने गई थीं, लेकिन शाम तक घर वापस नहीं लौटीं। बाद में उनका शव जंगल में झाड़ियों के बीच मिला। पुलिस ने आरोप लगाया था कि दो आरोपियों ने महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म कर उनकी हत्या कर दी।

ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 376(2)(g) के तहत दोषी पाया और हत्या के लिए मौत की सजा सुनाई। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने बाद में एससी/एसटी अधिनियम के तहत आरोपों से बरी करते हुए मौत की सजा की पुष्टि की।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था और घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। अदालत ने दो मुख्य परिस्थितियों पर विशेष ध्यान दिया- “लास्ट सीन” थ्योरी और आरोपियों की पहचान।

पीठ ने कहा कि केवल शक के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने टिप्पणी की, “गंभीर संदेह भी कानूनी प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।”

अभियोजन का दावा था कि घटना वाले दिन कुछ लड़कियों ने जंगल में दो संदिग्ध युवकों को देखा था। बाद में उन्हीं के बताए हुलिए के आधार पर स्केच तैयार किए गए और आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आरोपियों की पहचान की प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं। अदालत ने कहा कि आरोपियों को पहले से गवाह नहीं जानते थे, फिर भी टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) नहीं कराई गई।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि स्केच बनाने वाले व्यक्ति को न तो गवाह बनाया गया और न ही उसकी पहचान बताई गई। यहां तक कि स्केच की मूल कॉपी भी अदालत में पेश नहीं की गई।

पीठ ने कहा, “TIP नहीं कराया जाना अभियोजन की कहानी की विश्वसनीयता को गंभीर रूप से कमजोर करता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि अभियोजन ने नेहा नाम की उस लड़की को गवाह नहीं बनाया, जो कथित रूप से बाकी लड़कियों के साथ जंगल में मौजूद थी और जिसने संदिग्धों को देखा था।

अदालत ने कहा कि ऐसे महत्वपूर्ण गवाह को पेश न करना अभियोजन पक्ष के खिलाफ जाता है और इससे जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।

अभियोजन ने दावा किया था कि घटनास्थल से मिला फटा हुआ शर्ट का पॉकेट आरोपी की शर्ट से मेल खाता था। साथ ही कुछ कपड़े और गहने भी आरोपियों की निशानदेही पर बरामद होने का दावा किया गया।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन बरामदगियों और फॉरेंसिक साक्ष्यों की विश्वसनीयता भी संदेह से परे साबित नहीं हुई। अदालत ने जब्त वस्तुओं की सुरक्षित कस्टडी, फॉरेंसिक जांच में देरी और जांच प्रक्रिया में कई खामियों की ओर इशारा किया।

सभी तथ्यों और साक्ष्यों की समीक्षा के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी और मजबूत श्रृंखला साबित करने में विफल रहा।

अदालत ने माना कि मामले में कई गंभीर संदेह और जांच संबंधी कमियां मौजूद हैं, जिनका लाभ आरोपियों को मिलना चाहिए।

इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आरोपियों की दोषसिद्धि और मौत की सजा रद्द करते हुए उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया।

Case Details

Case Title: Mehtab v. State of Uttarakhand

Case Number: Criminal Appeal Nos. 1342-1343 of 2018 with Criminal Appeal Nos. 1340-1341 of 2018

Judge: Justice Sandeep Mehta , Justice Vikram Nath and Justice Vijay Bishnoi

Decision Date: May 27, 2026

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