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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पैनासिया बायोटेक पर ‘मिसब्रांडेड वैक्सीन’ केस फिर शुरू करने का आदेश

Vivek G.
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केरल राज्य एवं अन्य बनाम मेसर्स पैनेशिया बायोटेक लिमिटेड एवं अन्य, सुप्रीम कोर्ट ने पैनासिया बायोटेक के खिलाफ ‘मिसब्रांडेड वैक्सीन’ मामले में केरल हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर आपराधिक कार्यवाही बहाल की।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पैनासिया बायोटेक पर ‘मिसब्रांडेड वैक्सीन’ केस फिर शुरू करने का आदेश

नई दिल्ली में मंगलवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार और ड्रग्स इंस्पेक्टर की अपील स्वीकार करते हुए एक अहम फैसला सुनाया। अदालत ने केरल हाईकोर्ट का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें पैनासिया बायोटेक लिमिटेड के खिलाफ दायर आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया गया था।

दो जजों की पीठ-जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी-ने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन और मनोवैज्ञानिक लेने की प्रक्रिया कानून के अनुरूप थी।

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पृष्ठभूमि

मामला वर्ष 2006 का है। केरल के त्रिशूर में एक अभिभावक ने शिकायत की थी कि उन्होंने अपने बच्चे के टीकाकरण के लिए ‘ईज़ी फाइव’ पेंटावैलेंट वैक्सीन खरीदी, लेकिन अंदर की शीशी पर ‘ईज़ी फोर’ टेट्रावैलेंट वैक्सीन लिखा था।

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ड्रग्स इंस्पेक्टर ने जांच के बाद आरोप लगाया कि बाहरी पैकेट और अंदर की शीशी के लेबल में अंतर है। बाहरी डिब्बे पर हेपेटाइटिस-बी घटक (HbSAg) का उल्लेख था, जबकि अंदर की शीशी पर उसका जिक्र नहीं था।

शिकायत में कहा गया कि यह ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 की धारा 17(ब) और 17(स) के तहत “मिसब्रांडेड” (भ्रामक लेबल वाली) दवा है।

20 जनवरी 2009 को मजिस्ट्रेट के समक्ष औपचारिक शिकायत दायर की गई और समन जारी हुए।

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केरल हाईकोर्ट ने 14 जुलाई 2022 को यह कहते हुए कार्यवाही रद्द कर दी थी कि आरोपियों का निवास मजिस्ट्रेट के क्षेत्राधिकार से बाहर था। ऐसे में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 202 के तहत पहले अनिवार्य जांच होनी चाहिए थी।

हाईकोर्ट का मानना था कि यह प्रक्रिया अपनाए बिना समन जारी करना उचित नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने दो प्रमुख सवालों पर विचार किया-

1. क्या मामला समय-सीमा (Limitation) के भीतर था?

2. क्या धारा 202 CrPC के तहत जांच अनिवार्य थी?

1. समय-सीमा पर अदालत की राय

पीठ ने कहा कि अपराध की जानकारी और आरोपियों की पहचान अलग-अलग समय पर सामने आई। अदालत ने माना कि आरोपियों की पहचान 18 अप्रैल 2006 को स्पष्ट हुई। शिकायत 20 जनवरी 2009 को दाखिल हुई, जो तीन साल की वैधानिक सीमा के भीतर थी।

पीठ ने कहा, “लिमिटेशन की गणना आरोपी की पहचान सामने आने की तारीख से होगी, न कि प्रारंभिक शिकायत की तारीख से।”

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2. धारा 202 CrPC पर निर्णय

यहां अदालत ने स्पष्ट किया कि जब शिकायत किसी सरकारी अधिकारी द्वारा आधिकारिक कर्तव्य के तहत की जाती है, तो स्थिति अलग होती है।

पीठ ने कहा, “विधायिका ने सार्वजनिक सेवक द्वारा दायर शिकायत को अलग दर्जा दिया है।”

अदालत ने अपने पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट को हर स्थिति में अलग से जांच कराना अनिवार्य नहीं है।

इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की उस दलील को स्वीकार नहीं किया कि धारा 202 का पालन न करने से पूरी कार्यवाही अवैध हो जाती है।

दूसरा मामला: ‘स्टैंडर्ड क्वालिटी’ से कम सिरिंज

इसी फैसले में एक अन्य अपील पर भी सुनवाई हुई, जिसमें एक कंपनी की सिरिंज को “स्टैंडर्ड क्वालिटी” से कम पाया गया था।

हाईकोर्ट ने वहां भी धारा 202 और कंपनी के निदेशकों की जिम्मेदारी (धारा 34, ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट) के आधार पर मामला रद्द किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निदेशकों की भूमिका तथ्य का प्रश्न है, जिसे ट्रायल कोर्ट में तय किया जाना चाहिए। प्रारंभिक स्तर पर इसे खारिज करना जल्दबाजी होगी।

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अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।

मजिस्ट्रेट द्वारा 10 जुलाई 2012 को लिया गया संज्ञान और जारी समन वैध करार दिया गया।

हालांकि, कंपनी के तत्कालीन प्रबंध निदेशक के निधन को देखते हुए अदालत ने निर्देश दिया कि उस समय कंपनी का संचालन करने वाले जिम्मेदार व्यक्तियों को आरोपी के रूप में शामिल किया जाए और नए सिरे से समन जारी किए जाएं।

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस निर्णय को मामले के गुण-दोष पर अंतिम राय नहीं माना जाएगा। ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार आगे की कार्यवाही करेगा।

Case Title: The State of Kerala & Anr. v. M/s Panacea Biotec Ltd. & Anr.

Case No.: Criminal Appeal (Arising out of SLP (Crl.) No. 4524 of 2023)

Decision Date: 26 February 2026

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