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सुप्रीम कोर्ट ने MSRTC कर्मचारी को राहत दी: 1993 से बैक वेजेस का आदेश, बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला रद्द

Shivam
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सुप्रीम कोर्ट ने MSRTC कर्मचारी को 1993 से बैक वेजेस देने का आदेश दिया और हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए श्रम न्यायालय के आदेश को बहाल किया। - बालाजी मधुकर कोंकणवर बनाम महाराष्ट्र राज्य सड़क परिवहन निगम

सुप्रीम कोर्ट ने MSRTC कर्मचारी को राहत दी: 1993 से बैक वेजेस का आदेश, बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम श्रम विवाद में कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उसे वर्षों की लंबी कानूनी लड़ाई का लाभ दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी को उसके वैध अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता, चाहे देरी प्रशासन की ओर से ही क्यों न हुई हो।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बालाजी मधुकर कोकनवार बनाम महाराष्ट्र राज्य सड़क परिवहन निगम (MSRTC) से जुड़ा है। याचिकाकर्ता को 1 अप्रैल 1993 को क्लीनर के रूप में दैनिक वेतन पर नियुक्त किया गया था।

कुछ ही समय बाद, मई 1994 में उनकी सेवा मौखिक रूप से समाप्त कर दी गई। उन्होंने इस फैसले को चुनौती दी और श्रम आयुक्त के समक्ष मामला रखा, जहां उन्हें पुनर्नियुक्ति और बैक वेजेस का आदेश मिला।

हालांकि, इस आदेश का पालन नहीं हुआ, जिसके बाद मामला श्रम न्यायालय पहुंचा। अदालत ने उनकी सेवा समाप्ति को अवैध ठहराते हुए पुनर्नियुक्ति और वेतन देने का निर्देश दिया।

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कर्मचारी को 2003 में दोबारा काम पर लिया गया, लेकिन नियमित नियुक्ति नहीं दी गई। 2007 में औद्योगिक न्यायालय ने आदेश दिया कि 180 दिन की सेवा पूरी करने के बाद उन्हें नियमित किया जाना चाहिए।

इसके बावजूद, निगम ने 2011 तक उन्हें नियमित कर्मचारी नहीं बनाया। इस बीच अन्य लोगों की नियुक्तियां होती रहीं।

2016 में कर्मचारी ने फिर से दावा किया कि उसे 1993 से ही नियमित मानते हुए वेतन दिया जाए। श्रम न्यायालय ने 2020 में उसके पक्ष में फैसला देते हुए अक्टूबर 1993 से जनवरी 2011 तक बैक वेजेस देने का आदेश दिया।

लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि कर्मचारी ने लगातार अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया और लंबे समय तक सेवा भी दी।

अदालत ने यह तर्क खारिज कर दिया कि कर्मचारी ने 2011 में नियुक्ति स्वीकार कर ली थी, इसलिए वह पुराने लाभ नहीं मांग सकता।

पीठ ने टिप्पणी की,

“यह मानना उचित नहीं है कि केवल नियुक्ति स्वीकार करने से कर्मचारी अपने पूर्व अधिकारों से वंचित हो जाए।”

अदालत ने यह भी कहा कि नियोक्ता द्वारा 2007 के आदेश के बावजूद 5 साल बाद नियमित करने की शर्त लगाना “असमान सौदेबाजी शक्ति” (unequal bargaining power) का उदाहरण है।

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए श्रम न्यायालय के 2020 के आदेश को बहाल कर दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि कर्मचारी को अक्टूबर 1993 से 20 जनवरी 2011 तक के लिए ₹8,09,218 बैक वेजेस दिए जाएं।

हालांकि, 12% ब्याज को घटाकर 8% कर दिया गया। साथ ही, यदि निर्धारित समय में भुगतान नहीं किया गया, तो 12% ब्याज फिर लागू होगा।

इसके अतिरिक्त, अदालत ने कर्मचारी को ₹1 लाख मुकदमे की लागत के रूप में देने का आदेश भी दिया।

Case Details

Case Title: Balaji Madhukar Konkanwar vs. Maharashtra State Road Transport Corporation

Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 21724 of 2022

Judges: Justice Sanjay Karol and Justice Nongmeikapam Kotiswar Singh

Decision Date: April 20, 2026

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