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सुप्रीम कोर्ट: अपील में अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने का अधिकार सीमित, ग्वालियर भूमि विवाद में अपील खारिज

Vivek G.
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गोबिंद सिंह और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपील में अतिरिक्त साक्ष्य पेश करना अधिकार नहीं बल्कि अपवाद है। ग्वालियर भूमि विवाद में याचिका खारिज।

सुप्रीम कोर्ट: अपील में अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने का अधिकार सीमित, ग्वालियर भूमि विवाद में अपील खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अपील के चरण में अतिरिक्त साक्ष्य (additional evidence) पेश करना कोई स्वाभाविक अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 41 नियम 27 के तहत केवल विशेष परिस्थितियों में ही अतिरिक्त साक्ष्य स्वीकार किए जा सकते हैं।

इसी सिद्धांत को दोहराते हुए कोर्ट ने ग्वालियर की जमीन से जुड़े पुराने विवाद में दायर अपीलों को खारिज कर दिया और मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

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मामले की पृष्ठभूमि

विवाद ग्वालियर के मुरार क्षेत्र में स्थित एक भूमि से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि यह जमीन उनके पूर्वजों की पैतृक संपत्ति है और वे पिछले कई दशकों से इस पर कब्जे में हैं।

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याचिकाकर्ताओं के अनुसार, वर्ष 1989 में सरकारी अधिकारियों ने कथित रूप से जमीन पर लगे तार, वहां बने दो दुकानों और खड़ी फसल को हटाने का प्रयास किया। इसके बाद उन्होंने सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर मालिकाना हक की घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा (permanent injunction) की मांग की।

ट्रायल कोर्ट का फैसला

ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 1996 में याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला देते हुए माना कि:

• भूमि पर याचिकाकर्ताओं का कब्जा और स्वामित्व सिद्ध होता है

• प्रतिवादी पक्ष अपने स्वामित्व का कोई दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका

इसी आधार पर अदालत ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में डिक्री पारित कर दी।

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हाईकोर्ट में मामला पलटा

इस फैसले को चुनौती देते हुए प्रतिवादी पक्ष ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।

हाईकोर्ट ने 2009 में ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया और कहा कि जिस पुराने फैसले के आधार पर याचिकाकर्ता अपने अधिकार का दावा कर रहे हैं, वह एकतरफा (ex-parte) था और उस मुकदमे में केंद्र सरकार पक्षकार ही नहीं थी। इसलिए वह फैसला केंद्र सरकार पर बाध्यकारी नहीं हो सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता भूमि पर अपने स्वामित्व को साबित करने के लिए ठोस दस्तावेजी प्रमाण पेश नहीं कर सके।

सुप्रीम कोर्ट में उठे मुख्य तर्क

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि:

• हाईकोर्ट ने अपील तय करते समय Order 41 Rule 27 CPC के तहत अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने की उनकी अर्जी पर पहले विचार नहीं किया

• अतिरिक्त दस्तावेज, विशेषकर जनरल लैंड रजिस्टर (GLR), यह साबित कर सकते थे कि जमीन निजी भूमि के रूप में दर्ज है

दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने कहा कि:

• भूमि 1953 में केंद्र सरकार के स्वामित्व में आ गई थी

• याचिकाकर्ताओं का दावा केवल लंबे कब्जे के आधार पर है, जो पर्याप्त नहीं है

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि अपीलीय अदालत सामान्यतः ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड पर ही फैसला करती है और अतिरिक्त साक्ष्य स्वीकार करना एक अपवाद है।

पीठ ने कहा:

“Order 41 Rule 27 CPC के तहत अतिरिक्त साक्ष्य तभी स्वीकार किए जा सकते हैं जब यह साबित हो कि उचित प्रयास के बावजूद वे पहले पेश नहीं किए जा सके या न्याय के लिए उनकी आवश्यकता हो।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अपील के चरण में पक्षकारों को अपने मामले की कमियों को दूर करने के लिए नए साक्ष्य पेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से संकेत मिलता है कि याचिकाकर्ताओं के पूर्वजों ने पहले एक ऐसा मुकदमा दायर किया था जिसमें वास्तविक मालिकों को पक्षकार नहीं बनाया गया था और उसी के आधार पर बाद में राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराया गया।

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अदालत ने इस तरह की कार्यवाही पर असंतोष जताते हुए कहा कि सच्चे मालिक की जानकारी के बिना डिक्री प्राप्त करना उचित नहीं माना जा सकता।

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।

इसलिए अदालत ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के 12 अगस्त 2009 और 15 मार्च 2011 के फैसलों को बरकरार रखते हुए याचिकाकर्ताओं की अपीलें खारिज कर दीं।

Case Title: Gobind Singh & Ors. vs Union of India & Ors.

Case No.: Civil Appeal Nos. 5168–5169 of 2011

Decision Date: 09 March 2026

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