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मोबाइल जांच पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: "कानूनी जांच में प्राइवेसी का उल्लंघन कहां?"-ईडी को रोक से इनकार

Vivek G.
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जितेंद्र कुमार मेहता बनाम प्रवर्तन निदेशालय और अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने ईडी द्वारा जब्त मोबाइल की जांच पर रोक लगाने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि कानूनी जांच में प्राइवेसी का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। जानिए पूरा मामला।

मोबाइल जांच पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: "कानूनी जांच में प्राइवेसी का उल्लंघन कहां?"-ईडी को रोक से इनकार

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कोलकाता के कारोबारी जितेंद्र मेहता को बड़ी राहत देने से इनकार कर दिया। प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा जब्त किए गए मोबाइल फोन की जांच पर रोक लगाने की मांग को अदालत ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि जब जांच कानून के तहत हो रही हो, तो उसमें निजता के उल्लंघन का सवाल कहां उठता है।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि बिना किसी स्पष्ट आरोप के उनके मोबाइल फोन का फॉरेंसिक परीक्षण किया जा रहा है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले निजता के अधिकार का उल्लंघन है।

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सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जहां जांच कानूनी तरीके से हो रही हो, वहां प्राइवेसी का सवाल कहां आता है? अगर मोबाइल में कोई ऐसा डेटा है जो मामले से जुड़ा नहीं है, तो उसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।”

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पीठ ने यह भी कहा कि अदालत निर्दोष लोगों की रक्षा करना जानती है, लेकिन जिन पर गंभीर आर्थिक अनियमितताओं से जुड़े संदेह हों, उन्हें जांच से बचाया नहीं जा सकता।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सी. आर्यमा सुंदरम ने दलील दी कि मेहता के खिलाफ कोई ‘प्रेडिकेट ऑफेंस’ दर्ज नहीं है और इसके बावजूद उनका मोबाइल फोन जब्त कर लिया गया। उन्होंने कहा कि बिना किसी तय दिशा-निर्देश के पूरे फोन का डेटा निकालना अनुचित है और यह “फिशिंग इन्क्वायरी” जैसा है।

इस पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सवाल किया कि अगर बड़े पैमाने पर आर्थिक अपराध की जांच चल रही हो, तो क्या मोबाइल फोन की जांच भी नहीं की जा सकती? उन्होंने कहा कि यदि जांच एजेंसी किसी ऐसे डेटा का इस्तेमाल करती है जो मामले से जुड़ा नहीं है, तो उस स्तर पर अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।

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न्यायमूर्ति बागची ने यह भी स्पष्ट किया कि मनी लॉन्ड्रिंग कानून के तहत तलाशी के समय कारण बताना अनिवार्य नहीं है, जैसा कि गिरफ्तारी के मामलों में होता है। उन्होंने कहा कि ईसीआईआर किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि अपराध से जुड़ा होता है।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि यदि फोन की जांच हो गई तो उनकी याचिका निष्प्रभावी हो जाएगी। इसलिए अंतरिम रोक जरूरी है। लेकिन अदालत इस दलील से सहमत नहीं हुई।

अंत में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम राहत देने से इनकार करते हुए नोटिस जारी किया और कहा कि मामले में आरोपों की प्रकृति को समझने के बाद ही आगे निर्णय लिया जाएगा। कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 27 जनवरी 2026 तय की है और याचिका को इसी तरह के अन्य मामलों के साथ टैग कर दिया है।

Case Title: Jitendra Kumar Mehta v. Directorate of Enforcement & Ors.

Case No.: W.P. (Crl.) No. 30/2026

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