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सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में भीड़ पर सख्त रुख, राज्यों को ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशन बढ़ाने के निर्देश

Vivek G.
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सुहास चकमा बनाम भारत संघ एवं अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में भीड़ और अमानवीय हालात पर सख्त टिप्पणी करते हुए राज्यों को ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशन बढ़ाने के निर्देश दिए।

सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में भीड़ पर सख्त रुख, राज्यों को ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशन बढ़ाने के निर्देश

देश की जेलों में बढ़ती भीड़ और कैदियों की स्थिति पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि सजा का मतलब अमानवीय जीवन नहीं है। अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को “ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशन” (खुली जेल व्यवस्था) को मजबूत और विस्तारित करने के स्पष्ट निर्देश दिए।

यह फैसला Suhas Chakma बनाम Union of India याचिका में आया, जिसमें जेलों में अत्यधिक भीड़ और मानवीय हालात का मुद्दा उठाया गया था ।

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मामले की पृष्ठभूमि

याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि देश की कई जेलें अपनी क्षमता से कहीं अधिक कैदियों को रख रही हैं, जिससे बुनियादी सुविधाओं पर गंभीर असर पड़ रहा है।

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सुनवाई के दौरान अदालत के सामने 2023 की “प्रिजन स्टैटिस्टिक्स इंडिया” रिपोर्ट रखी गई। इसमें बताया गया कि देशभर की जेलों की औसत क्षमता से अधिक 120% से ज्यादा कैदी रखे जा रहे हैं। कुछ राज्यों में यह आंकड़ा 150% से भी अधिक है।

अदालत ने पहले भी 2018 में “In Re: Inhuman Conditions in 1382 Prisons” मामले में सुधार के निर्देश दिए थे। बावजूद इसके, हालात में पर्याप्त सुधार नहीं हुआ।

ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशन (OCI) ऐसी खुली जेलें हैं जहाँ चयनित कैदियों को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता दी जाती है। वे काम कर सकते हैं, कुछ राज्यों में परिवार के साथ रह सकते हैं और समाज में धीरे-धीरे पुनर्वास की दिशा में बढ़ते हैं।

अदालत ने नोट किया कि राजस्थान जैसे राज्यों में यह मॉडल प्रभावी ढंग से काम कर रहा है। आँकड़ों से यह भी सामने आया कि बंद जेलों में प्रति कैदी खर्च काफी अधिक है, जबकि खुली जेलों में यह खर्च बहुत कम है ।

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न्यायालय की टिप्पणियाँ

फैसले की शुरुआत में पीठ ने नेल्सन मंडेला का उद्धरण दिया “किसी राष्ट्र को जानना हो तो उसकी जेलों में जाकर देखिए।”

अदालत ने कहा, “संवैधानिक लोकतंत्र की असली परीक्षा इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और हाशिए पर खड़े लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है।”

पीठ ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा का अधिकार जेल के दरवाजे पर खत्म नहीं होता। कैदी भी मूल अधिकारों से पूरी तरह वंचित नहीं हो जाते।

अदालत ने यह भी पाया कि कई राज्यों में ओपन जेलें या तो हैं ही नहीं, या उनकी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो रहा। महिलाओं को इन संस्थानों में बहुत कम स्थान मिला है। कई राज्यों में तो उन्हें पात्र ही नहीं माना जाता।

पीठ ने टिप्पणी की, “ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशन को प्रयोग के रूप में नहीं, बल्कि सुधारात्मक न्याय प्रणाली के अभिन्न हिस्से के रूप में देखना होगा।”

राज्यों की जिम्मेदारी पर जोर

केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि मॉडल प्रिजन मैनुअल, 2016 और मॉडल प्रिजन्स एंड करेक्शनल सर्विसेज एक्ट, 2023 राज्यों को मार्गदर्शन के लिए भेजे गए हैं। चूंकि जेलें राज्य सूची का विषय हैं, इसलिए इन्हें लागू करना राज्यों की जिम्मेदारी है ।

अदालत ने इस पर कहा कि केवल मॉडल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, उन्हें जमीन पर लागू करना भी उतना ही जरूरी है।

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महिला कैदी और असमानता

सुनवाई में सामने आया कि कई राज्यों में महिलाओं के लिए ओपन जेल की सुविधा नहीं है। जहाँ सुविधा है भी, वहाँ उपयोग बहुत कम है। अदालत ने इसे गंभीर चिंता का विषय माना।

पीठ ने कहा कि सुधारात्मक व्यवस्था में लैंगिक समानता जरूरी है और महिलाओं को भी पुनर्वास के समान अवसर मिलने चाहिए।

अंतिम निर्णय

सभी पक्षों को सुनने और राज्यों से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत निर्देश जारी किए। अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को:

• ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशन की संख्या बढ़ाने,

• पात्रता मानदंडों की समीक्षा करने,

• महिलाओं के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने,

• और एक समान न्यूनतम मानक विकसित करने

के लिए बाध्यकारी दिशानिर्देश दिए।

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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इन निर्देशों के पालन की निगरानी की जाएगी और आवश्यक होने पर मुख्य सचिवों की व्यक्तिगत उपस्थिति भी सुनिश्चित की जा सकती है ।

इसी के साथ अदालत ने याचिका का निस्तारण करते हुए स्पष्ट किया कि जेल सुधार केवल प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है।

Case Title: Suhas Chakma v. Union of India & Ors.

Case No.: Writ Petition (C) No. 1082 of 2020

Decision Date: February 26, 2026

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