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40 साल पुराने कस्टम्स मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, सजा बरकरार पर जेल अवधि घटाई

Vivek G.
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अमद नूरमद बकाली बनाम गुजरात राज्य और अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने 1985 के विदेशी घड़ी तस्करी मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित किया।

40 साल पुराने कस्टम्स मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, सजा बरकरार पर जेल अवधि घटाई

सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में पकड़ी गई विदेशी घड़ियों की तस्करी के एक पुराने मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन लगभग चार दशक पुराने इस मामले में सजा को घटाकर पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने यह निर्णय सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 30 अप्रैल 1985 की रात का है। मंडवी (गुजरात) में कस्टम अधिकारियों को गुप्त सूचना मिली थी कि विदेशी ब्रांड की घड़ियाँ मछुआरों के जेटी के पास छिपाई गई हैं।

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अधिकारियों ने पंच गवाहों की मौजूदगी में खुदाई की। दो बोरों से कुल 777 विदेशी कलाई घड़ियाँ और 879 स्ट्रैप बरामद हुए। इनकी अनुमानित कीमत उस समय 2.22 लाख रुपये से अधिक बताई गई।

जांच में आरोप लगा कि ये घड़ियाँ जहाज के जरिए भारत लाई गई थीं और कई लोगों ने इन्हें छिपाने, बेचने या रखने में भूमिका निभाई।

ट्रायल कोर्ट ने सात आरोपियों को कस्टम्स एक्ट की धारा 135(1)(b)(i) के तहत दोषी ठहराया और तीन-तीन साल की सख्त कैद की सजा सुनाई। अपील और पुनरीक्षण याचिकाएं भी खारिज हो गईं, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

अदालत में दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से कहा गया कि सजा मुख्य रूप से धारा 108 के तहत दर्ज बयानों पर आधारित है। बचाव पक्ष का तर्क था कि केवल ऐसे बयानों के आधार पर दोषसिद्धि टिक नहीं सकती।

यह भी बताया गया कि कुछ आरोपी अब इस दुनिया में नहीं रहे और शेष आरोपी बुजुर्ग हो चुके हैं। उन्होंने करीब एक साल जेल भी काटी है।

सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि मामला बड़े पैमाने की तस्करी से जुड़ा है, इसलिए नरमी नहीं बरती जानी चाहिए।

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कोर्ट की टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने पहले ही इस मुद्दे पर विस्तार से विचार किया था। अदालत ने माना कि कस्टम अधिकारियों द्वारा धारा 108 के तहत दर्ज बयान, यदि स्वेच्छा से दिए गए हों, तो साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य हैं।

पीठ ने कहा, “रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि बयान दबाव या धमकी में दिए गए थे।”

अदालत ने यह भी देखा कि बरामदगी से जुड़े पंचनामा और अन्य सामग्री बयान का समर्थन करते हैं। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि दोषसिद्धि केवल इकबालिया बयान पर टिकी है।

हालांकि, सजा के सवाल पर अदालत ने अलग दृष्टिकोण अपनाया। पीठ ने कहा कि यह घटना 1985 की है, यानी लगभग 40 साल पुरानी। कुछ सह-आरोपी बरी हो चुके हैं और कुछ की मृत्यु हो चुकी है।

अदालत ने टिप्पणी की, “इन परिस्थितियों में अब और कारावास न्याय के हित में नहीं होगा।”

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फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा 26 मार्च 2003 को दी गई दोषसिद्धि को बरकरार रखा।

लेकिन सजा को घटाकर उतनी अवधि कर दी गई, जितनी आरोपी पहले ही जेल में बिता चुके हैं। चूंकि आरोपी जमानत पर थे, इसलिए उन्हें दोबारा आत्मसमर्पण करने की जरूरत नहीं है। उनकी जमानत बांड समाप्त मानी गई।

अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली गई।

Case Title: Amad Noormamad Bakali v. State of Gujarat & Ors.

Case No.: Criminal Appeal No. 1000 of 2012 with Criminal Appeal Nos. 1232–1237 of 2012

Decision Date: 23 February 2026

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