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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पूर्व सैनिकों को 1996/2006 से पूरी दिव्यांग पेंशन एरियर, 6% ब्याज सहित

Vivek G.
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भारत संघ अपने सचिव एवं अन्य के माध्यम से बनाम एसजीटी गिरीश कुमार एवं अन्य। सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पूर्व सैनिकों को 1996/2006 से पूरी दिव्यांग पेंशन एरियर और 6% ब्याज मिलेगा, लिमिटेशन लागू नहीं।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पूर्व सैनिकों को 1996/2006 से पूरी दिव्यांग पेंशन एरियर, 6% ब्याज सहित

नई दिल्ली की सर्द सुबह में सुप्रीम कोर्ट की कोर्ट नंबर में जब यह मामला पुकारा गया, तो माहौल असाधारण था। एक तरफ केंद्र सरकार, दूसरी ओर देश के वे पूर्व सैनिक जो वर्षों से अपनी दिव्यांग पेंशन के पूरे बकाए की मांग कर रहे थे। आखिरकार, शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में कहा-हक अगर मान लिया गया है, तो उसे अधूरा नहीं किया जा सकता।

मामला था Supreme Court of India में सुनवाई का, जिसमें केंद्र सरकार बनाम पूर्व सैनिकों के बीच दिव्यांग पेंशन के एरियर (बकाया) को लेकर विवाद था। फैसले की प्रति रिकॉर्ड में उपलब्ध है ।

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मामला क्या था?

मुख्य विवाद इस बात पर था कि क्या दिव्यांग पेंशन का बकाया केवल आवेदन से तीन साल पहले तक सीमित किया जा सकता है, या फिर पात्र पूर्व सैनिकों को 1 जनवरी 1996 या 1 जनवरी 2006 से पूरा एरियर मिलना चाहिए।

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यह पूरा विवाद पहले के ऐतिहासिक फैसले Union of India v. Ram Avtar से जुड़ा था। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि सेवा पूरी कर सेवानिवृत्त हुए और सैन्य सेवा से संबंधित दिव्यांगता वाले कर्मियों को भी ‘ब्रॉडबैंडिंग’ का लाभ मिलेगा। यानी 20% दिव्यांगता को भी न्यूनतम 50% मानकर पेंशन की गणना की जाएगी।

लेकिन सवाल था-इस लाभ का एरियर कितने समय से दिया जाए?

पृष्ठभूमि

सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि भले ही पेंशन का अधिकार मान लिया गया हो, लेकिन एरियर तीन साल से अधिक पीछे नहीं दिया जा सकता। उनका कहना था कि लिमिटेशन एक्ट (समय-सीमा कानून) लागू होगा।

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वहीं पूर्व सैनिकों के वकीलों ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में कानून साफ कर दिया, तब तक अधिकार अनिश्चित स्थिति में था। जैसे ही फैसला आया, उनका अधिकार “पक्का” हो गया। ऐसे में एरियर सीमित करना अन्याय होगा।

कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ

पीठ ने साफ कहा कि पेंशन कोई “सरकारी कृपा” नहीं है। यह सेवा के बदले दिया जाने वाला वैध अधिकार है।

अदालत ने कहा, “पेंशन न तो अनुग्रह है और न ही दान। यह पूर्व सेवा का स्थगित प्रतिफल (deferred compensation) है।”

न्यायालय ने यह भी माना कि दिव्यांग पेंशन संपत्ति के समान अधिकार है। इसे बिना कानून के आधार के रोका या घटाया नहीं जा सकता।

पीठ ने सरकार को “मॉडल नियोक्ता” बताते हुए कहा कि जब किसी नीति और न्यायिक फैसले से लाभ मान लिया गया है, तो उसे चुनिंदा तरीके से लागू नहीं किया जा सकता।

सरकार की दलील क्यों खारिज हुई?

सरकार ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि देरी या लापरवाही (delay or laches) के कारण एरियर सीमित होना चाहिए। लेकिन अदालत ने कहा कि 10 दिसंबर 2014 तक स्थिति स्पष्ट नहीं थी। उसी दिन Ram Avtar मामले में तीन जजों की पीठ ने अंतिम रूप से कानून तय किया।

कोर्ट ने कहा कि जब खुद सरकार ने बाद में नीति बनाकर 1996 या 2006 से लाभ देने का निर्णय लिया, तो अब यह नहीं कहा जा सकता कि केवल तीन साल का एरियर मिलेगा।

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पीठ ने टिप्पणी की, “अधिकार को सिद्धांत रूप में मान लेना और व्यवहार में उसे सीमित कर देना स्वीकार्य नहीं है।”

अंतिम निर्णय

अदालत ने केंद्र सरकार की सभी अपीलें खारिज कर दीं।

साथ ही, उन मामलों में जहां ट्रिब्यूनल ने एरियर को तीन साल तक सीमित किया था, वह आदेश रद्द कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया कि पात्र पूर्व सैनिकों को 1 जनवरी 1996 या 1 जनवरी 2006 से, जैसा लागू हो, पूरा एरियर दिया जाए।

इसके साथ 6% वार्षिक ब्याज भी देने का निर्देश दिया गया।

कोर्ट ने अंत में कहा कि इस मामले में कोई लागत (cost) नहीं लगाई जाएगी।

Case Title: Union of India through its Secretary & Ors. vs SGT Girish Kumar & Ors.

Case No.: Civil Appeal Nos. 6820–6824 of 2018 (along with connected matters)

Decision Date: February 12, 2026

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