Logo

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: भूमि अधिग्रहण मामलों में सरकारी देरी पर लिमिटेशन एक्ट की छूट नहीं

Vivek G.
Add Court Book as a preferred source on Google

डिप्टी कमिश्नर और स्पेशल लैंड एक्विजिशन ऑफिसर बनाम मेसर्स एस.वी. ग्लोबल मिल लिमिटेड, सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण कानून 2013 पर बड़ा फैसला देते हुए कहा कि सरकारी देरी पर लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 लागू नहीं होगी।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: भूमि अधिग्रहण मामलों में सरकारी देरी पर लिमिटेशन एक्ट की छूट नहीं

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को भूमि अधिग्रहण से जुड़े सैकड़ों मामलों पर एक साथ सुनवाई हुई। अदालत में माहौल गंभीर था, क्योंकि सवाल केवल कानूनी समय-सीमा का नहीं, बल्कि ज़मीन मालिकों के अधिकारों का भी था। कोर्ट के सामने मुख्य मुद्दा यह था कि क्या सरकार भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 के तहत अपील दायर करने में हुई देरी को लिमिटेशन एक्ट, 1963 की धारा 5 के ज़रिये माफ करा सकती है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद कर्नाटक में ज़मीन अधिग्रहण से जुड़े मामलों से शुरू हुआ। राज्य के डिप्टी कमिश्नर और विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने विभिन्न मामलों में देरी से अपीलें दायर की थीं। सरकार का तर्क था कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं और विभागीय पत्राचार के कारण देरी हुई, इसलिए इसे माफ किया जाना चाहिए।

Read also:-सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 1971 का भूमि-वेस्टिंग आदेश बहाल, राज्य सरकार की अपील मंजूर

दूसरी ओर, ज़मीन मालिकों और कंपनियों-जिनमें एम/एस एस.वी. ग्लोबल मिल लिमिटेड भी शामिल थी-ने साफ कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 एक अलग और पूर्ण कानून है, जिसमें समय-सीमा को लेकर कोई ढील नहीं दी जा सकती।

Court Book subscription: bare acts, legal drafts, court judgments and ad-free legal news, plans from ₹30/month

कोर्ट में मुख्य सवाल

सुनवाई के दौरान पीठ ने एक सीधा सवाल रखा-

क्या भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत तय अपील की समय-सीमा पर लिमिटेशन एक्ट लागू हो सकता है?

अदालत ने यह भी पूछा कि क्या सरकारी विभागों को सिर्फ इसलिए राहत दी जा सकती है क्योंकि उनके यहां फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल तक घूमती हैं।

अदालत की अहम टिप्पणियां

पीठ ने अपने फैसले में साफ शब्दों में कहा कि 2013 का कानून एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर (self-contained) कानून है। इसमें हर चरण के लिए सख्त समय-सीमा तय की गई है।

अदालत ने टिप्पणी की,

“जहां कानून ने स्पष्ट समय-सीमा तय कर दी हो, वहां अदालतें उसे दरकिनार नहीं कर सकतीं।”

Read also:- 'भगोड़ापन' का आरोप गलत था: राजस्थान उच्च न्यायालय ने सीआरपीएफ कांस्टेबल की बहाली का आदेश दिया

कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकारी विभागों के लिए अलग मापदंड नहीं हो सकते।

“सिर्फ यह कह देना कि देरी सरकारी प्रक्रियाओं के कारण हुई, पर्याप्त कारण नहीं है।”

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 तभी लागू होती है, जब संबंधित कानून इसकी अनुमति देता हो। लेकिन भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।

अदालत ने माना कि इस कानून का उद्देश्य ज़मीन मालिकों को तेज़ और प्रभावी न्याय देना है। अगर देरी को आसानी से माफ किया गया, तो पूरे कानून का मकसद ही कमजोर हो जाएगा।

Read also:-गर्भावस्था शिक्षा में बाधा नहीं बननी चाहिए: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने BUMS की छात्रा को राहत दी, अगले सेमेस्टर के लिए रास्ता साफ किया

अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की सभी अपीलें खारिज कर दीं। अदालत ने कहा कि 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत अपील दायर करने में हुई देरी को माफ नहीं किया जा सकता।

इस तरह, कोर्ट ने ज़मीन मालिकों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए यह साफ कर दिया कि कानून की समय-सीमा सभी के लिए समान है-चाहे वह आम नागरिक हो या सरकार।

Case Title: The Deputy Commissioner and Special Land Acquisition Officer vs. M/s S.V. Global Mill Limited

Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (C) Nos. 215–216 of 2023 & connected matters

Decision Date: 9 February 2026

Download Judgment

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Get it on Google PlayDownload on the App Store
Join the Court Book WhatsApp channel for latest judgments, notifications, legal news and exam updates