Logo

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: यूपी में कब्जाधारियों को मिला मालिकाना हक, अपील खारिज

Vivek G.
Add Court Book as a preferred source on Google

राम नारायण (डी) एलआर और अन्य द्वारा बनाम उप मंडल अधिकारी और अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने यूपी जमीन विवाद में बड़ा फैसला सुनाते हुए कब्जाधारियों को धारा 123 के तहत मालिकाना हक दिया और अपील खारिज की।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: यूपी में कब्जाधारियों को मिला मालिकाना हक, अपील खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के एक पुराने जमीन विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया कि कानून के तहत नियमित किए गए कब्जे को बाद में चुनौती नहीं दी जा सकती। अदालत ने राम नारायण (मृतक) के उत्तराधिकारियों की सिविल अपील खारिज कर दी और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

यह विवाद मुजफ्फरनगर जिले के शामली स्थित एक भूखंड से जुड़ा था, जिस पर वर्षों से कब्जा कर घर बनाए गए थे।

Read also:-17 साल की लड़की ने माता-पिता संग जाने से किया इनकार, गुजरात हाईकोर्ट ने चिल्ड्रन होम भेजने का दिया आदेश

मामले की पृष्ठभूमि

विवादित जमीन प्लॉट नंबर 2362, क्षेत्रफल 1 बीघा 14 बिस्वा, शामली में स्थित है। यह जमीन पहले खजान सिंह के नाम दर्ज थी। 1970 के दशक में कुछ लोगों ने उस जमीन पर कब्जा कर मकान बना लिए।

Court Book subscription: bare acts, legal drafts, court judgments and ad-free legal news, plans from ₹30/month

बाद में खजान सिंह के पोतों ने 10 अगस्त 1984 को यह जमीन राम नारायण और अन्य को बेच दी। इसके बाद 11 अक्टूबर 1984 को खरीदारों ने उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम की धारा 143 के तहत जमीन को कृषि से आवासीय घोषित करा लिया।

लेकिन 1988 में तहसीलदार की रिपोर्ट के आधार पर उपजिलाधिकारी (एसडीओ) ने धारा 123 के तहत आदेश पारित कर कब्जाधारियों के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज करने का निर्देश दिया। खरीदारों ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन याचिका खारिज हो गई।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने 7 सितंबर 2007 के फैसले में कहा कि धारा 123(2) एक “कानूनी कल्पना” (legal fiction) पैदा करती है। इसका मतलब है कि यदि पात्र व्यक्ति ने 30 जून 1985 से पहले जमीन पर मकान बना लिया है, तो वह जमीन उसके नाम मानी जाएगी, चाहे कब्जा सहमति से हो या बिना अनुमति के।

Read also:-दादा-दादी 'फैमिली' में नहीं: मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, स्टांप ड्यूटी में छूट नहीं मिलेगी

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि धारा 143 के तहत की गई घोषणा से धारा 123 के प्रावधान खत्म नहीं होते।

अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि धारा 143 के बाद राजस्व अधिकारियों का अधिकार खत्म हो जाता है और सिविल कोर्ट का आदेश नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि 30 जून 1985 की कट-ऑफ तारीख महत्वपूर्ण है। तहसीलदार की रिपोर्ट और खुद अपीलकर्ताओं के दस्तावेजों से साफ है कि कब्जाधारी 1976-77 से जमीन पर रह रहे थे।

अदालत की मुख्य टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा कि विवाद बहुत सीमित दायरे में है।

अदालत ने कहा, “खरीद 10 अगस्त 1984 को हुई। उस समय जमीन पर कब्जा अपीलकर्ताओं के पास नहीं था। ऐसी स्थिति में खरीदी गई संपत्ति कब्जाधारियों के वैधानिक अधिकारों के अधीन रहेगी।”

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि “खरीद को इस तरह प्रस्तुत नहीं किया जा सकता कि वह धारा 123 के तहत उपलब्ध वैधानिक अधिकारों को निष्प्रभावी कर दे।”

अदालत ने माना कि यदि पात्र व्यक्ति ने 30 जून 1985 से पहले मकान बना लिया था, तो कानून स्वतः उसे उस भूमि का स्वामी मान लेता है।

Read also:-ट्रांसफर विवाद पर सुलह: सिक्किम हाईकोर्ट ने आपसी समझ से खत्म की NHM कर्मचारी की याचिका

अंतिम फैसला

न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं है।

अदालत ने कहा, “हम हाईकोर्ट के निर्णय से सहमत हैं और सिविल अपील खारिज की जाती है।”

इसके साथ ही संबंधित विशेष अनुमति याचिकाएं (SLP) भी खारिज कर दी गईं।

Case Title: Ram Narain (D) by LRs & Ors. v. The Sub Divisional Officer & Ors.

Case No.: Civil Appeal No. 4587 of 2009

Decision Date: February 25, 2026

Download Judgment

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Get it on Google PlayDownload on the App Store
Join the Court Book WhatsApp channel for latest judgments, notifications, legal news and exam updates