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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: उत्तराखंड की दो गन्ना सहकारी समितियां Multi-State नहीं, हाईकोर्ट का फैसला रद्द

Vivek G.
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रजिस्ट्रार केन कोऑपरेटिव सोसाइटीज एवं अन्य बनाम गुरदीप सिंह नरवाल (मृत) एलआर एवं अन्य के माध्यम से, सुप्रीम कोर्ट ने बाजपुर और गदरपुर गन्ना सहकारी समितियों को Multi-State Cooperative Society मानने से इनकार किया, हाईकोर्ट का फैसला रद्द।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: उत्तराखंड की दो गन्ना सहकारी समितियां Multi-State नहीं, हाईकोर्ट का फैसला रद्द

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: उत्तराखंड की दो गन्ना सहकारी समितियां Multi-State नहीं, हाईकोर्ट का फैसला रद्द ने उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन से जुड़े एक महत्वपूर्ण विवाद में फैसला सुनाते हुए कहा है कि उत्तराखंड के बाजपुर और गदरपुर की गन्ना उत्पादक सहकारी समितियों को Multi-State Cooperative Society नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने साफ किया कि राज्य के पुनर्गठन के बाद यदि सहकारी समितियों का पुनर्गठन कर दिया गया हो और उनका कार्यक्षेत्र एक ही राज्य तक सीमित हो जाए, तो केवल कानूनी कल्पना (legal fiction) के आधार पर उन्हें Multi-State Cooperative Society नहीं माना जा सकता।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद बाजपुर और गदरपुर की गन्ना उत्पादक सहकारी समितियों से जुड़ा है, जिनका संचालन पहले संयुक्त उत्तर प्रदेश में होता था।

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जब वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश का पुनर्गठन कर नया राज्य उत्तराखंड बनाया गया, तब इन समितियों के कार्यक्षेत्र के कुछ गांव उत्तर प्रदेश में और कुछ उत्तराखंड में चले गए।

इसके बाद दोनों राज्यों के अधिकारियों ने 8 फरवरी 2001 को बैठक कर यह तय किया कि ऐसी समितियों का पुनर्गठन किया जाएगा। इसी निर्णय के तहत:

• बाजपुर समिति से उत्तर प्रदेश के 34 गांव अलग कर दिए गए

• गदरपुर समिति से भी उत्तर प्रदेश के कुछ गांव हटाकर नए क्षेत्र तय किए गए

इस प्रक्रिया के बाद इन समितियों का संचालन मुख्य रूप से उत्तराखंड के भीतर सीमित हो गया।

विवाद कैसे शुरू हुआ

गांव सुवर के एक गन्ना किसान का नाम सदस्यता सूची से हटाए जाने के बाद विवाद शुरू हुआ। उन्होंने पहले हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन अदालत ने उन्हें वैकल्पिक उपाय अपनाने की सलाह दी।

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इसके बाद मामला केंद्रीय रजिस्ट्रार के समक्ष मध्यस्थता (arbitration) में गया।

मध्यस्थ ने 2004 में फैसला देते हुए कहा कि राज्य के पुनर्गठन के कारण यह समिति स्वतः Multi-State Cooperative Society बन गई थी, इसलिए सदस्यता हटाने का फैसला अवैध है।

बाद में हाईकोर्ट ने भी इसी आधार पर कहा कि चुनाव केंद्रीय रजिस्ट्रार के माध्यम से कराए जाने चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में क्या सवाल था

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि:

• क्या राज्य के पुनर्गठन के बाद सहकारी समितियां स्वतः Multi-State Cooperative Society बन जाती हैं?

• या फिर यदि उनका पुनर्गठन कर दिया गया हो और उनका कार्यक्षेत्र एक राज्य तक सीमित हो जाए, तो उन्हें राज्य की सहकारी समिति ही माना जाएगा?

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अदालत की अहम टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Multi-State Cooperative Societies Act, 2002 की धारा 103 में जो कानूनी कल्पना बनाई गई है, वह स्वतः लागू नहीं होती।

पीठ ने कहा:

“कानूनी कल्पना को उसी उद्देश्य तक सीमित रखा जाना चाहिए जिसके लिए उसे बनाया गया है। इसे ऐसे मामलों में लागू नहीं किया जा सकता जहां पुनर्गठन पहले ही कानून के तहत पूरा किया जा चुका हो।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल किसी संस्था का भौगोलिक क्षेत्र या उसके सदस्यों का अलग-अलग राज्यों में होना पर्याप्त नहीं है।

“किसी सहकारी समिति को Multi-State माने जाने के लिए उसके उद्देश्य स्वयं कई राज्यों में कार्य करने वाले होने चाहिए।”

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अदालत का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:

• बाजपुर और गदरपुर की गन्ना सहकारी समितियों का पुनर्गठन राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के तहत वैध तरीके से किया गया था।

• इन समितियों के उद्देश्य और कार्यक्षेत्र एक ही राज्य तक सीमित हैं।

• इसलिए इन्हें Multi-State Cooperative Society नहीं माना जा सकता।

अदालत ने इस आधार पर हाईकोर्ट का 14 मार्च 2007 का फैसला रद्द (quash) कर दिया। साथ ही राज्य कानून के तहत इन समितियों के चुनाव जल्द कराने के निर्देश दिए।

Case Title: Registrar Cane Cooperative Societies & Ors. v. Gurdeep Singh Narval (Dead) Through LRs & Ors.

Case No.: Civil Appeal Nos. 8743, 8744, 8745 & 8746 of 2013

Decision Date: 10 March 2026

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