Logo

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: आर्बिट्रेशन अवॉर्ड में दखल की सीमा तय, पोर्ट ट्रस्ट की अपील खारिज

Vivek G.
Add Court Book as a preferred source on Google

जान डे नुल ड्रेजिंग इंडिया प्रा. लिमिटेड बनाम तूतीकोरिन पोर्ट ट्रस्ट, सुप्रीम कोर्ट ने आर्बिट्रेशन अवॉर्ड में हस्तक्षेप की सीमा तय की, पोर्ट ट्रस्ट की अपील खारिज कर ड्रेजिंग कंपनी को राहत दी।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: आर्बिट्रेशन अवॉर्ड में दखल की सीमा तय, पोर्ट ट्रस्ट की अपील खारिज

नई दिल्ली की कोर्ट नंबर में आज माहौल गंभीर था। लंबी दलीलों के बाद Supreme Court of India ने साफ शब्दों में कहा कि आर्बिट्रेशन अवॉर्ड में अदालतें अपनी मर्जी से दोबारा व्याख्या नहीं कर सकतीं। जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की पीठ ने जन डी नुल ड्रेजिंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में फैसला सुनाते हुए मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के आदेश को पलट दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला तमिलनाडु के तूतुकुड़ी पोर्ट से जुड़ा है। Jan De Nul Dredging India Pvt. Ltd. को Tuticorin Port Trust ने चैनल और बेसिन को गहरा करने की बड़ी परियोजना सौंपी थी।

Read also:-PSC विस्तार पर वेदांता को झटका: दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र के फैसले में हस्तक्षेप से किया इनकार

2009 में टेंडर निकला, 2010 में काम मिला और करीब 465 करोड़ रुपये की यह परियोजना तय समय से आठ महीने पहले पूरी कर दी गई। काम पूरा होने के बाद भी भुगतान को लेकर विवाद खड़ा हुआ। कंपनी का कहना था कि साइट समय पर न मिलने से उसके बैकहो ड्रेजर (BHD) को बेकार खड़ा रहना पड़ा, जिसके लिए मुआवजा बनता है।

Court Book subscription: bare acts, legal drafts, court judgments and ad-free legal news, plans from ₹30/month

विवाद आर्बिट्रेशन में गया। तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल ने कंपनी के पक्ष में फैसला देते हुए करीब 14.66 करोड़ रुपये का अवॉर्ड दिया। मद्रास हाईकोर्ट के सिंगल जज ने भी इस अवॉर्ड को सही ठहराया।

लेकिन पोर्ट ट्रस्ट यहीं नहीं रुका। डिवीजन बेंच में अपील की गई, जहां यह कहते हुए अवॉर्ड का हिस्सा हटा दिया गया कि बैकहो ड्रेजर “मेजर ड्रेजर” नहीं है, इसलिए उसके लिए आइडल टाइम चार्ज नहीं मिल सकता। इसी फैसले को चुनौती देते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

अदालत का अवलोकन

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने साफ कहा कि आर्बिट्रेशन कानून का मकसद न्यूनतम न्यायिक हस्तक्षेप है।

पीठ ने टिप्पणी की,

“Section 37 के तहत अपीलीय अदालत, Section 34 की सीमाओं से बाहर नहीं जा सकती। अगर अवॉर्ड कानून के खिलाफ नहीं है, तो उसमें दखल का सवाल ही नहीं उठता।”

Read also:-जस्टिस GR स्वामीनाथन पर कथित आपत्तिजनक पुस्तक की रिलीज़ पर मद्रास हाईकोर्ट की रोक

कोर्ट ने माना कि आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने अनुबंध की शर्तों की व्याख्या तार्किक ढंग से की थी। सिंगल जज द्वारा उसे सही ठहराने के बाद डिवीजन बेंच का अलग नजरिया अपनाना कानूनन गलत था।

पोर्ट ट्रस्ट का तर्क था कि अनुबंध में केवल “मेजर ड्रेजर” के लिए आइडल टाइम मुआवजा तय है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि अनुबंध की धाराओं को अलग-थलग पढ़ा नहीं जा सकता।

पीठ ने स्पष्ट किया कि अगर काम में देरी या साइट न मिलने से कोई उपकरण बेकार बैठता है और अनुबंध इसकी अनुमति देता है, तो मुआवजा रोका नहीं जा सकता।

Read also:-लिखित परीक्षा के बाद नियम बदले? सुप्रीम कोर्ट ने बिहार इंजीनियर भर्ती में रेट्रोस्पेक्टिव संशोधन पर लगाई रोक

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के 15 मार्च 2021 के आदेश को अवैध और अस्थिर करार देते हुए रद्द कर दिया। इसके साथ ही आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल का मूल अवॉर्ड बहाल कर दिया गया।

अदालत ने कहा कि यदि हर आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को अपीलों की लंबी श्रृंखला में उलझाया जाएगा, तो कानून का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।

मामले में कोई लागत नहीं लगाई गई और अपील स्वीकार कर ली गई।

Case Title: Jan De Nul Dredging India Pvt. Ltd. vs Tuticorin Port Trust

Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 8803 of 2021

Case Type: Arbitration Appeal

Decision Date: 07 January 2026

Download Judgment

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Get it on Google PlayDownload on the App Store
Join the Court Book WhatsApp channel for latest judgments, notifications, legal news and exam updates