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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: फ्लैट किराए पर देने भर से खरीदार 'कंज्यूमर' होने से बाहर नहीं होगा

Vivek G.
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विनीत बहारी और अन्य बनाम मैसर्स एमजीएफ डेवलपर्स लिमिटेड और अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फ्लैट किराए पर देने से खरीदार उपभोक्ता की श्रेणी से बाहर नहीं होगा। NCDRC का आदेश रद्द, मामला फिर सुनवाई को भेजा।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: फ्लैट किराए पर देने भर से खरीदार 'कंज्यूमर' होने से बाहर नहीं होगा

सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट विवाद से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि सिर्फ फ्लैट को किराए पर देने से खरीदार को उपभोक्ता की श्रेणी से बाहर नहीं किया जा सकता। अदालत ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के फैसले को रद्द करते हुए मामला दोबारा सुनवाई के लिए भेज दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद गुरुग्राम के ‘द विलाज’ नामक हाउसिंग प्रोजेक्ट से जुड़ा है। वर्ष 2005 में खरीदारों ने इस प्रोजेक्ट में फ्लैट बुक कराया और लगभग 15 लाख रुपये की शुरुआती राशि जमा की। बाद में उन्हें टॉवर-सी में एक यूनिट आवंटित की गई और 2006 में फ्लैट बायर एग्रीमेंट हुआ।

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समझौते के मुताबिक 36 महीने के भीतर कब्जा दिया जाना था, लेकिन खरीदारों का आरोप था कि तय समय 2009 में बीतने के बावजूद कब्जा नहीं दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि बिल्डर ने बिना जानकारी दिए टॉवर का लेआउट बदल दिया और अतिरिक्त रकम भी वसूली।

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खरीदारों ने अंततः 2015 में फ्लैट का कब्जा लिया, लेकिन देरी, अतिरिक्त शुल्क और मानसिक उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए 2017 में NCDRC में शिकायत दाखिल की। उन्होंने ब्याज, मुआवजा और अन्य राहत की मांग की थी।

NCDRC ने खरीदारों की शिकायत खारिज कर दी थी। आयोग ने कहा था कि खरीदारों ने फ्लैट को किराए पर दे दिया था, इसलिए उनका मकसद व्यावसायिक माना जाएगा और वे उपभोक्ता कानून के तहत संरक्षण पाने के पात्र नहीं होंगे।

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सुप्रीम कोर्ट में दलीलें

खरीदारों की ओर से दलील दी गई कि फ्लैट व्यक्तिगत उपयोग के लिए खरीदा गया था ताकि वे अपने माता-पिता के पास रह सकें। उनका कहना था कि बाद में फ्लैट किराए पर देना अलग बात है और इससे खरीद का मूल उद्देश्य व्यावसायिक नहीं माना जा सकता।

वहीं बिल्डर पक्ष ने NCDRC के फैसले का समर्थन किया और कहा कि फ्लैट किराए पर देना लाभ कमाने की मंशा दर्शाता है।

अदालत की अहम टिप्पणियां

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत ‘कंज्यूमर’ का निर्धारण इस बात से होता है कि खरीद का प्रमुख उद्देश्य क्या था।

पीठ ने स्पष्ट किया, “सिर्फ संपत्ति को किराए पर देना यह साबित नहीं करता कि खरीदार ने उसे व्यावसायिक उद्देश्य से खरीदा था।”

अदालत ने आगे कहा कि यह तय करने के लिए कि खरीद व्यावसायिक थी या नहीं, हर मामले के तथ्यों को अलग-अलग देखना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि सेवा प्रदाता यह दावा करता है कि खरीद व्यावसायिक उद्देश्य से हुई थी, तो इसे साबित करने की जिम्मेदारी उसी की होगी। अदालत ने कहा, “कानून के सामान्य सिद्धांत के अनुसार, जो पक्ष दावा करता है, उसे ही उसे साबित करना होता है।”

पीठ ने यह भी माना कि केवल एक या अधिक फ्लैट खरीदना अपने आप में व्यावसायिक उद्देश्य साबित नहीं करता।

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सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि बिल्डर यह साबित करने में असफल रहा कि खरीदारों ने फ्लैट लाभ कमाने के मकसद से खरीदा था। अदालत ने कहा कि सिर्फ किराए पर देना पर्याप्त आधार नहीं है।

इसके साथ ही अदालत ने NCDRC का 11 मई 2023 का आदेश रद्द कर दिया और खरीदारों की शिकायत को दोबारा सुनवाई के लिए आयोग को वापस भेज दिया।

पीठ ने निर्देश दिया कि NCDRC अब शिकायत को मेरिट के आधार पर और कानून के अनुसार तय करेगा। अपील को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले का निपटारा कर दिया।

Case Title: Vinit Bahri & Anr. vs. M/s MGF Developers Ltd. & Anr.

Case No.: Civil Appeal No. 6588 of 2023

Decision Date: 04 February 2026

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