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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी से हुई संपत्ति बिक्री रद्द, हाईकोर्ट का निर्णय बरकरार

Vivek G.
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थरम्मेल पीतांबरन और अन्य। बनाम टी. उषाकृष्णन एवं अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी से हुई संपत्ति बिक्री को अवैध बताया। हाईकोर्ट का फैसला बरकरार, सिविल अपील खारिज।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी से हुई संपत्ति बिक्री रद्द, हाईकोर्ट का निर्णय बरकरार

दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की अदालत में गुरुवार को एक पारिवारिक संपत्ति विवाद का लंबे समय से इंतज़ार किया जा रहा फैसला सुनाया गया। मामला केरल के कोझिकोड की एक संपत्ति से जुड़ा था, जहां भाई ने कथित तौर पर बहन की जमीन फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी के ज़रिये बेच दी थी। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि बिना वैध अधिकार के की गई बिक्री कानून की नज़र में टिक नहीं सकती।

मामले की पृष्ठभूमि

इस विवाद की शुरुआत साल 2013 में हुई, जब संपत्ति की असली मालकिन, जो मुंबई में रहती हैं, ने अपने भाई और अन्य के खिलाफ सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया। बहन का आरोप था कि उन्होंने भाई को केवल संपत्ति के प्रबंधन के लिए सीमित अधिकार दिए थे, न कि बेचने का।

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लेकिन भाई ने दावा किया कि उन्हें पूरी तरह से संपत्ति बेचने का अधिकार दिया गया था और इसी आधार पर 2007 में दो रजिस्टर्ड सेल डीड्स की गईं। बहन को जब इस बिक्री की जानकारी मिली, तो उन्होंने पावर ऑफ अटॉर्नी को रद्द कर दिया और बिक्री को अवैध बताते हुए अदालत का दरवाज़ा खटखटाया।

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ट्रायल कोर्ट से हाईकोर्ट तक

ट्रायल कोर्ट ने दस्तावेज़ों की बारीकी से जांच के बाद बहन के पक्ष में फैसला दिया। कोर्ट ने पाया कि जिस पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर बिक्री की गई, उसमें “बिक्री” से जुड़े शब्द बाद में जोड़े गए लगते हैं। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि मूल पावर ऑफ अटॉर्नी पेश नहीं की गई।

हालांकि, जिला अदालत ने इस फैसले को पलट दिया और कहा कि नोटरी द्वारा प्रमाणित पावर ऑफ अटॉर्नी मान्य है। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां ट्रायल कोर्ट का फैसला फिर से बहाल कर दिया गया।

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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि,

“फोटोकॉपी मात्र को तब तक सबूत नहीं माना जा सकता, जब तक कानून के अनुसार सेकेंडरी एविडेंस पेश करने की प्रक्रिया पूरी न की जाए।”

अदालत ने साफ किया कि यदि मूल दस्तावेज़ मौजूद नहीं है, तो उसके अभाव का ठोस कारण और वैधानिक प्रक्रिया का पालन ज़रूरी है। पीठ ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने तथ्यों की दोबारा जांच नहीं की, बल्कि यह देखा कि निचली अपीलीय अदालत ने गलत और अमान्य सबूतों पर भरोसा किया था।

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अदालत का अंतिम निर्णय

सभी दलीलों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी। अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि कथित पावर ऑफ अटॉर्नी कानूनी रूप से साबित नहीं की गई और उसी आधार पर की गई बिक्री शून्य है।

Case Title: Tharammel Peethambaran & Anr. vs T. Ushakrishnan & Anr.

Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 11868 of 2024

Decision Date: 06 February 2026

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