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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: स्कूलों में सैनिटरी पैड और अलग शौचालय लड़कियों का मौलिक अधिकार

Vivek G.
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डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत संघ, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: स्कूलों में सैनिटरी पैड, अलग शौचालय और माहवारी स्वच्छता को बताया शिक्षा का मौलिक अधिकार।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: स्कूलों में सैनिटरी पैड और अलग शौचालय लड़कियों का मौलिक अधिकार

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक बेहद अहम और सामाजिक दृष्टि से संवेदनशील मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि लड़कियों के लिए सुरक्षित माहवारी प्रबंधन (Menstrual Hygiene Management) शिक्षा के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्कूलों में सैनिटरी पैड, अलग शौचालय और स्वच्छता सुविधाओं की कमी सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14, 21,और 21A का उल्लंघन है।

यह फैसला डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार मामले में आया है, जिसमें देशभर के सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में मासिक धर्म से जुड़ी सुविधाओं की मांग की गई थी।

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मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता डॉ. जया ठाकुर ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर मांग की थी कि-

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• कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी पैड दिए जाएं

• सभी स्कूलों में अलग और सुरक्षित शौचालय हों

• शौचालयों की नियमित सफाई सुनिश्चित की जाए

• माहवारी को लेकर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएं

याचिका में कहा गया कि इन सुविधाओं की कमी के कारण लाखों लड़कियां हर महीने स्कूल छोड़ने को मजबूर होती हैं।

कोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा-

“मासिक धर्म किसी लड़की की पढ़ाई में बाधा नहीं बनना चाहिए। यह उसकी गरिमा और जीवन के अधिकार से जुड़ा विषय है।”

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कोर्ट ने माना कि

• माहवारी से जुड़ी सुविधाओं का अभाव लड़कियों की समानता के अधिकार का उल्लंघन है

• यह समस्या केवल स्वास्थ्य की नहीं, बल्कि शिक्षा तक पहुंच की बाधा है

• शिक्षा का अधिकार केवल स्कूल में दाखिले तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्मानजनक वातावरण भी शामिल करता है

क्या कहा गया शिक्षा के अधिकार पर?

अदालत ने साफ कहा कि-

• शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं

• यदि स्कूल में शौचालय, पानी और स्वच्छता नहीं है, तो पढ़ाई संभव नहीं

• लड़कियों का मासिक धर्म उन्हें स्कूल से दूर करता है, जो संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है

कोर्ट ने यह भी माना कि मासिक धर्म से जुड़ी असुविधाएं लड़कियों के स्कूल छोड़ने की बड़ी वजह बनती हैं।

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सरकार की दलीलें

केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि-

• कई राज्यों में सैनिटरी पैड वितरण योजनाएं चल रही हैं

• ‘समग्र शिक्षा अभियान’ के तहत स्कूलों में वेंडिंग मशीन और इन्सिनरेटर लगाए गए हैं

• स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय निर्माण किया जा रहा है

हालांकि अदालत ने कहा कि योजनाएं होना काफी नहीं, उनका ज़मीनी स्तर पर प्रभाव दिखना जरूरी है।

अदालत का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि-

• मासिक धर्म प्रबंधन (MHM) अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है

• स्कूलों में लड़कियों के लिए बुनियादी सुविधाएं देना सरकार की जिम्मेदारी है

• सिर्फ नीति बनाना काफी नहीं, ठोस क्रियान्वयन जरूरी

• राज्यों को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी लड़की केवल माहवारी के कारण पढ़ाई न छोड़े

कोर्ट ने यह भी माना कि यह विषय लैंगिक समानता और गरिमा से जुड़ा हुआ है।

Case Title: Dr. Jaya Thakur vs Union of India

Case No.: Writ Petition (Civil) No. 1000 of 2022

Decision Date: 30/01/2026

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