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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बिना अलग नोटिस भी उठाए जा सकते हैं सभी मध्यस्थता विवाद, हाईकोर्ट का आदेश पलटा

Vivek G.
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मेसर्स भागीरथ इंजीनियरिंग लिमिटेड बनाम केरल राज्य, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना अलग नोटिस भी मध्यस्थ सभी विवाद सुन सकता है। केरल हाईकोर्ट का आदेश रद्द, मध्यस्थ का पुरस्कार बहाल।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बिना अलग नोटिस भी उठाए जा सकते हैं सभी मध्यस्थता विवाद, हाईकोर्ट का आदेश पलटा

नई दिल्ली में सोमवार 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में एक अहम मध्यस्थता विवाद पर सुनवाई हुई, जहां कोर्ट ने साफ किया कि केवल इसलिए किसी पक्ष के दावे नहीं रोके जा सकते कि उसने अलग से मध्यस्थता नोटिस जारी नहीं किया। अदालत ने केरल हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए मध्यस्थ के पुरस्कार को पूरी तरह बहाल कर दिया।

Background of the Case

मामला केरल स्टेट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट से जुड़ा है, जिसके तहत भगहीरथा इंजीनियरिंग लिमिटेड को राज्य में सड़क रखरखाव के चार पैकेज दिए गए थे। काम के दौरान भुगतान, बिटुमेन मूल्य, मूल्य समायोजन और ब्याज से जुड़े विवाद सामने आए।

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कंपनी ने इन विवादों को पहले अनुबंध में तय प्रक्रिया के अनुसार एडजुडिकेटर के पास रखा। एडजुडिकेटर ने चार में से दो मुद्दों पर कंपनी के पक्ष में फैसला दिया। इसके बाद राज्य सरकार ने एक मुद्दे पर असहमति जताते हुए मध्यस्थता (Arbitration) की बात कही।

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मध्यस्थ न्यायाधिकरण ने सभी चार विवादों पर विचार करते हुए कंपनी के पक्ष में लगभग 1.99 करोड़ रुपये का पुरस्कार दिया।

हालांकि, जिला अदालत और बाद में केरल हाईकोर्ट ने यह कहते हुए इस पुरस्कार को रद्द कर दिया कि राज्य ने केवल एक विवाद के लिए मध्यस्थता मांगी थी और कंपनी ने बाकी मुद्दों के लिए अलग से नोटिस नहीं दिया।

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Court Observation

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा,

“मध्यस्थता का उद्देश्य विवादों का समग्र समाधान है, न कि तकनीकी आधार पर उन्हें टुकड़ों में बांटना।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि Arbitration and Conciliation Act, 1996 की धारा 21 केवल मध्यस्थता की शुरुआत और सीमा अवधि तय करने से जुड़ी है, न कि मध्यस्थ के अधिकार क्षेत्र को सीमित करने से।

पीठ ने माना कि राज्य सरकार का आचरण स्वयं यह दर्शाता है कि वह सभी विवादों को दोबारा खोलना चाहती थी। ऐसे में बाद में यह कहना कि मध्यस्थ अधिकार क्षेत्र से बाहर चला गया, स्वीकार्य नहीं है।

अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि धारा 21 का नोटिस न देना अपने आप में किसी दावे को खारिज करने का आधार नहीं हो सकता, यदि विवाद मध्यस्थता समझौते के दायरे में आते हों।

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कोर्ट के शब्दों में,

“धारा 21 प्रक्रिया से जुड़ी है, अधिकार क्षेत्र से नहीं।”

Final Decision

सभी तथ्यों और पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट का 7 जनवरी 2025 का फैसला रद्द कर दिया। इसके साथ ही 29 जून 2006 को दिया गया मध्यस्थ का पुरस्कार पूरी तरह बहाल कर दिया गया।

अदालत ने कहा कि इस मामले में मध्यस्थ ने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहते हुए फैसला दिया था और उसमें किसी कानूनी त्रुटि का आधार नहीं बनता।

Case Title: M/s Bhagheeratha Engineering Ltd. vs State of Kerala

Case No.: Civil Appeal No. 39 of 2026

Case Type: Arbitration Appeal

Decision Date: 5 January 2026

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