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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: फ्लैट डिले केस में बिल्डर जिम्मेदार, जमीन मालिक नहीं; अपील खारिज

Vivek G.
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श्रीगणेश चंद्रशेखरन एवं अन्य बनाम मेसर्स यूनिशायर होम्स एलएलपी एवं अन्य, सुप्रीम कोर्ट ने फ्लैट डिले केस में बड़ा फैसला देते हुए कहा कि निर्माण में देरी के लिए केवल बिल्डर जिम्मेदार, जमीन मालिक नहीं। अपील खारिज।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: फ्लैट डिले केस में बिल्डर जिम्मेदार, जमीन मालिक नहीं; अपील खारिज

दिल्ली की ठंडी सुबह में सुप्रीम कोर्ट की कोर्टरूम नंबर… में हल्की-सी खामोशी थी, जब इस मामले की सुनवाई शुरू हुई। मामला था फ्लैट खरीदारों की उस लंबी लड़ाई का, जो छह साल से अधिक की देरी के बाद भी अपने घर का इंतजार कर रहे थे।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा - निर्माण में देरी के लिए बिल्डर जिम्मेदार है, जमीन मालिक नहीं। अदालत ने खरीदारों की अपील खारिज कर दी।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद SRIGANESH CHANDRASEKARAN & OTHERS vs M/S UNISHIRE HOMES LLP & OTHERS से जुड़ा है ।

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जमीन मालिकों ने 24 फरवरी 2012 को डेवलपर के साथ जॉइंट डेवलपमेंट एग्रीमेंट (JDA) किया और पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA) भी दिया। 2013 में प्लान पास हुआ और उसके बाद फ्लैट खरीदारों के साथ सेल एग्रीमेंट हुए।

एग्रीमेंट के अनुसार 36 महीने में फ्लैट का कब्जा देना था। यह अवधि अगस्त 2016 में खत्म हो गई। छह महीने की अतिरिक्त मोहलत भी फरवरी 2017 में समाप्त हो गई। इसके बावजूद प्रोजेक्ट पूरा नहीं हुआ।

आखिरकार खरीदारों ने राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग (NCDRC) में शिकायत दर्ज की। आयोग ने माना कि छह साल से अधिक की देरी हुई है और इसे सेवा में कमी (deficiency in service) माना।

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राष्ट्रीय आयोग का आदेश

19 अक्टूबर 2023 को आयोग ने डेवलपर को निर्देश दिया कि:

• निर्माण पूरा करे,

• ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट प्राप्त करे,

• तीन महीने में फ्लैट का कब्जा दे,

• और देरी की अवधि के लिए 6% वार्षिक ब्याज दे।

बाद में रिव्यू याचिका में जमीन मालिकों को भी संयुक्त रूप से जिम्मेदार ठहराया गया, लेकिन यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया में सुनवाई का अवसर न देने के कारण रद्द कर दिया।

फिर दोबारा सुनवाई के बाद आयोग ने कहा कि जमीन मालिक निर्माण में देरी के लिए जिम्मेदार नहीं हैं।

यही हिस्सा सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

अदालत में क्या दलीलें दी गईं

खरीदारों की ओर से कहा गया कि जमीन मालिकों ने पावर ऑफ अटॉर्नी दिया था, इसलिए वे “प्रिंसिपल” हैं और डेवलपर उनका “एजेंट”। ऐसे में एजेंट की गलती की जिम्मेदारी प्रिंसिपल पर भी आती है।

दूसरी ओर जमीन मालिकों के वकील ने तर्क दिया कि JDA के अनुसार निर्माण की पूरी जिम्मेदारी डेवलपर की थी। उन्होंने कहा, “जमीन मालिक न तो निर्माण में शामिल थे, न ही देरी के लिए जिम्मेदार।”

डेवलपर ने भी आयोग के आदेश का समर्थन किया।

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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

पीठ ने JDA और GPA की धाराओं का बारीकी से अध्ययन किया। अदालत ने कहा कि दस्तावेज़ों से साफ है कि:

• निर्माण का काम डेवलपर को करना था।

• बिक्री समझौते डेवलपर ने अपने हिस्से के फ्लैट्स के लिए किए।

• देरी भी उन्हीं फ्लैट्स में हुई जो डेवलपर के हिस्से में थे।

अदालत ने स्पष्ट कहा, “For the lapse on the part of the developer, the landowners… cannot be held liable for deficiency in service.”

पीठ ने यह भी नोट किया कि खरीदारों ने कहीं यह आरोप नहीं लगाया कि जमीन मालिकों की किसी कार्रवाई या चूक के कारण देरी हुई।

हाँ, टाइटल ट्रांसफर (मालिकाना हक का हस्तांतरण) के मामले में दोनों — जमीन मालिक और डेवलपर — जिम्मेदार रहेंगे। इसलिए आयोग द्वारा उन्हें बिक्री विलेख (sale deed) निष्पादित करने का निर्देश सही माना गया।

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अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय आयोग ने सही तरीके से देरी की जिम्मेदारी केवल डेवलपर पर डाली है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामले में संयुक्त जिम्मेदारी (joint and several liability) तथ्यों के आधार पर तय होती है। इस मामले में जमीन मालिकों की कोई सीधी भूमिका निर्माण में नहीं थी और वे JDA के तहत डेवलपर से क्षतिपूर्ति (indemnity) से संरक्षित थे।

इन कारणों से सुप्रीम कोर्ट ने अपील में कोई मेरिट नहीं पाई और उसे खारिज कर दिया।

Case Title: Srig anesh Chandrasekaran & Others v. M/s Unishire Homes LLP & Others

Case No.: Civil Appeal Nos. 10527–10528 of 2024

Decision Date: February 20, 2026

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