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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: PTU VC डॉ. एस. मोहन पद पर बने रहेंगे, UGC नियमों को दी प्राथमिकता

Vivek G.
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डॉ. एस. मोहन बनाम कुलपति के सचिव, पीटीयू, सुप्रीम कोर्ट ने PTU कुलपति डॉ. एस. मोहन को पद पर बने रहने की अनुमति दी। जानिए UGC नियम, कोर्ट की टिप्पणी और पूरा फैसला।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: PTU VC डॉ. एस. मोहन पद पर बने रहेंगे, UGC नियमों को दी प्राथमिकता

सुप्रीम कोर्ट ने पुडुचेरी टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (PTU) के कुलपति पद से जुड़े एक अहम विवाद में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालयों में कुलपति की नियुक्ति UGC नियमों के अनुरूप होना अनिवार्य है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि मौजूदा कुलपति डॉ. एस. मोहन को उनके कार्यकाल के अंत तक पद पर बने रहने दिया जाएगा। यह फैसला शैक्षणिक प्रशासन और संवैधानिक संतुलन दोनों के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद तब शुरू हुआ जब डॉ. एस. मोहन को 2021 में पुडुचेरी टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी का पहला कुलपति नियुक्त किया गया।

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उनकी नियुक्ति को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि-

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• चयन समिति का गठन UGC Regulations, 2018 के अनुसार नहीं हुआ

• समिति में UGC चेयरमैन का नामित सदस्य शामिल नहीं था

• राज्य कानून (PTU Act) UGC नियमों से टकराता है

मद्रास हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए डॉ. मोहन की नियुक्ति को रद्द कर दिया था, हालांकि उन्हें 30 जून 2024 तक पद पर बने रहने की अनुमति दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट में क्या सवाल उठा?

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि-

• क्या राज्य कानून, UGC नियमों से अलग व्यवस्था कर सकता है?

• क्या कुलपति की नियुक्ति में UGC की भूमिका अनिवार्य है?

• क्या राष्ट्रपति की मंजूरी से बना कानून UGC नियमों से ऊपर हो सकता है?

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कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने साफ शब्दों में कहा-

“उच्च शिक्षा में मानकों का निर्धारण संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है और UGC नियम बाध्यकारी हैं।”

कोर्ट ने कहा कि:

• UGC Regulations, 2018 संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची-I के अंतर्गत आते हैं

• राज्य सरकार या विश्वविद्यालय इनसे अलग नियम नहीं बना सकते

• सर्च कमेटी में UGC प्रतिनिधि का न होना नियमों का उल्लंघन है

अदालत ने यह भी माना कि मद्रास हाईकोर्ट द्वारा PTU एक्ट की धारा 14(5) को अवैध ठहराना कानूनी रूप से सही था।

फिर भी डॉ. मोहन को राहत क्यों?

हालांकि अदालत ने नियुक्ति प्रक्रिया को गलत माना, लेकिन डॉ. मोहन को हटाने से इनकार कर दिया।

पीठ ने कहा-

“डॉ. मोहन की योग्यता, ईमानदारी या कार्यप्रणाली पर कोई सवाल नहीं उठा है। ऐसे में उन्हें हटाना अनुचित और नुकसानदेह होगा।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि:

• वे पिछले चार वर्षों से निर्विघ्न कार्य कर रहे हैं

• उनकी नियुक्ति में व्यक्तिगत दोष नहीं है

• अचानक हटाने से विश्वविद्यालय प्रशासन प्रभावित होगा

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अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में निर्देश दिया कि-

• डॉ. एस. मोहन अपने कार्यकाल (दिसंबर 2026) तक पद पर बने रहेंगे

• या तब तक, जब तक नया कुलपति UGC नियमों के अनुसार नियुक्त न हो जाए

• भविष्य में चयन प्रक्रिया पूरी तरह UGC नियमों के अनुरूप होनी चाहिए

• पुडुचेरी सरकार को कानून में आवश्यक संशोधन करने की छूट दी गई

Case Title: Dr. S. Mohan v. Secretary to Chancellor, PTU

Case No.: Civil Appeal Nos. 54–55 of 2025

Decision Date: 30 January 2026

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