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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 2 महीने की सज़ा कम कर 3 साल की सख्त कैद बहाल, मुआवजा सज़ा का विकल्प नहीं

Vivek G.
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परमेश्वरी बनाम तमिलनाडु राज्य एवं अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के प्रयास मामले में सज़ा घटाने के हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर तीन साल की सख्त कैद बहाल की।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 2 महीने की सज़ा कम कर 3 साल की सख्त कैद बहाल, मुआवजा सज़ा का विकल्प नहीं

नई दिल्ली में सुनवाई के दौरान अदालत कक्ष में सन्नाटा छाया रहा जब सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा-“सज़ा अपराध के अनुरूप होनी चाहिए, केवल समय बीत जाने से सज़ा कम नहीं की जा सकती।”

न्यायमूर्ति Vijay Bishnoi और न्यायमूर्ति Rajesh Bindal की पीठ ने तमिलनाडु के एक पुराने आपराधिक मामले में मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए तीन साल की कठोर सज़ा बहाल कर दी।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 6 जून 2009 की दोपहर का है। गांव में पुरानी रंजिश थी। आरोप है कि निजी प्रतिवादियों ने चाकू से हमला कर पीड़ित को सीने, पेट और हाथ में गंभीर चोटें पहुंचाईं। डॉक्टर ने अदालत में कहा था कि “अगर तुरंत इलाज नहीं मिलता तो ये चोटें जानलेवा हो सकती थीं।”

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ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों-पीड़ित, उसकी पत्नी और डॉक्टर की गवाही-को भरोसेमंद मानते हुए आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 307 (हत्या का प्रयास), 326 और 324 के तहत दोषी ठहराया। तीन साल की कठोर कैद और 5,000 रुपये जुर्माना लगाया गया।

सेशन कोर्ट ने भी इस सज़ा को सही माना।

हाईकोर्ट में क्या हुआ?

मामला जब मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा, तो आरोपियों ने दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी। उन्होंने केवल सज़ा कम करने की मांग की। दलील दी गई कि घटना को 10 साल से अधिक हो चुके हैं, पीड़ित की बाद में किसी अन्य घटना में हत्या हो चुकी है, और वे 1 लाख रुपये मुआवजा देने को तैयार हैं।

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हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन सज़ा को तीन साल से घटाकर “पहले से काटी गई अवधि” यानी लगभग दो महीने कर दिया। साथ ही 50,000 रुपये प्रत्येक अतिरिक्त जुर्माना लगाकर कुल 1 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को गलत बताया। फैसले में कहा गया, “अत्यधिक सहानुभूति दिखाकर अपर्याप्त सज़ा देना न्याय व्यवस्था को कमजोर करता है।”

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि मुआवजा, सज़ा का विकल्प नहीं हो सकता। अदालत ने कहा, “सज़ा दंडात्मक है, जबकि मुआवजा केवल पीड़ित को राहत देने के लिए है। इसे पैसों से खरीदा नहीं जा सकता।”

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बिश्नोई ने टिप्पणी की, “केवल समय बीत जाना या पीड़ित की बाद की मृत्यु, इस अपराध की गंभीरता को कम नहीं कर सकता।”

अदालत ने कई पुराने निर्णयों का हवाला देते हुए दोहराया कि सज़ा अपराध की गंभीरता के अनुपात में होनी चाहिए।

पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने सज़ा कम करते समय पर्याप्त कारण दर्ज नहीं किए और यह न्यायिक विवेक का सही प्रयोग नहीं था।

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पीड़ित अधिकार और समाज का हित

फैसले में अदालत ने पीड़ितों के अधिकारों पर भी जोर दिया। कहा गया कि आपराधिक न्याय प्रणाली का उद्देश्य केवल अपराधी को सुधारने का मौका देना नहीं है, बल्कि समाज में कानून के प्रति विश्वास बनाए रखना भी है।

अदालत ने कहा, “अगर गंभीर अपराधों में केवल जुर्माना बढ़ाकर सज़ा घटा दी जाए, तो गलत संदेश जाएगा कि अपराधी पैसा देकर जिम्मेदारी से बच सकते हैं।”

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई तीन साल की कठोर सज़ा को बहाल कर दिया गया।

अदालत ने निर्देश दिया कि निजी प्रतिवादी चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करें और शेष सज़ा काटें। यदि वे आत्मसमर्पण नहीं करते, तो ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार आवश्यक कदम उठाए।

अपील स्वीकार कर ली गई।

Case Title: Parameshwari vs State of Tamil Nadu & Ors.

Case No.: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 7495 of 2021

Decision Date: 17 February 2026

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