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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: जज हटाने की प्रक्रिया में स्पीकर की कार्रवाई वैध, याचिका खारिज

Vivek G.
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X बनाम लोकसभा अध्यक्ष का कार्यालय, सुप्रीम कोर्ट ने जज हटाने की प्रक्रिया पर बड़ा फैसला देते हुए कहा कि लोकसभा स्पीकर अकेले भी जांच समिति बना सकते हैं। पूरी खबर पढ़ें।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: जज हटाने की प्रक्रिया में स्पीकर की कार्रवाई वैध, याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक व्यवस्था से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में बड़ा और स्पष्ट फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि अगर लोकसभा और राज्यसभा - दोनों में एक ही दिन किसी जज को हटाने का प्रस्ताव दिया जाए, लेकिन उसे केवल एक सदन में ही स्वीकार किया जाए, तो भी उस सदन का स्पीकर जांच समिति गठित कर सकता है।

यह फैसला उस याचिका पर आया जिसमें एक हाईकोर्ट जज ने अपने खिलाफ शुरू की गई हटाने की प्रक्रिया को चुनौती दी थी। कोर्ट ने साफ कहा कि इस प्रक्रिया में कोई संवैधानिक या कानूनी खामी नहीं है।

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मामले की पृष्ठभूमि

मामला उस समय शुरू हुआ जब दिल्ली हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश के आवास पर आग लगने की घटना के बाद कथित रूप से नकदी मिलने की बात सामने आई। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस कमेटी ने जांच की और आरोपों को प्रथम दृष्टया सही पाया।

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इसके बाद:

• 21 जुलाई 2025 को लोकसभा में 100 से अधिक सांसदों ने जज को हटाने का नोटिस दिया राज्यसभा में भी 50 से ज्यादा सांसदों ने नोटिस दिया

हालांकि,

• राज्यसभा में उपसभापति ने नोटिस स्वीकार नहीं किया

• वहीं लोकसभा अध्यक्ष ने नोटिस स्वीकार कर तीन सदस्यीय जांच समिति गठित कर दी

याचिकाकर्ता जज ने इसी कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

मुख्य कानूनी सवाल

कोर्ट के सामने मुख्य रूप से ये सवाल थे:

1. क्या दोनों सदनों में एक ही दिन नोटिस दिए जाने पर संयुक्त समिति बनाना अनिवार्य है?

2. क्या राज्यसभा के उपसभापति को नोटिस खारिज करने का अधिकार है?

3. क्या लोकसभा स्पीकर अकेले समिति बना सकते हैं?

4. क्या इस प्रक्रिया से याचिकाकर्ता के अधिकारों का उल्लंघन हुआ?

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कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट की पीठ (न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता) ने विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा-

“कानून यह नहीं कहता कि यदि एक सदन में नोटिस अस्वीकृत हो जाए तो दूसरा सदन भी कार्रवाई नहीं कर सकता।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

• संयुक्त समिति तभी आवश्यक होती है, जब

दोनों सदनों में नोटिस स्वीकृत हों

• यहां राज्यसभा में नोटिस स्वीकार ही नहीं हुआ, इसलिए

लोकसभा अध्यक्ष को अकेले समिति गठित करने का पूरा अधिकार था

कोर्ट ने यह भी कहा कि:

“प्रावधानों की ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती जिससे पूरी संवैधानिक प्रक्रिया ठप हो जाए।”

उपसभापति की भूमिका पर अदालत की राय

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उपसभापति को नोटिस खारिज करने का अधिकार नहीं था।

इस पर कोर्ट ने कहा:

• संविधान के अनुच्छेद 91 के तहत

• जब सभापति का पद रिक्त हो

• तब उपसभापति को वही अधिकार मिलते हैं

इसलिए उपसभापति का फैसला पूरी तरह वैध था।

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कोर्ट का अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

• लोकसभा स्पीकर द्वारा बनाई गई समिति वैध है

• संयुक्त समिति की आवश्यकता नहीं थी

• याचिकाकर्ता को कोई कानूनी नुकसान नहीं हुआ

• याचिका में कोई दम

नतीजा:

• याचिका खारिज कर दी गई।

• जांच समिति की कार्यवाही जारी रहेगी।

Case Title: X vs Office of the Speaker of Lok Sabha

Case No.: Writ Petition (Civil) No. 1233 of 2025

Decision Date: 16 January 2026

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