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249 दिन की देरी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: CLB को समय बढ़ाने का अधिकार नहीं, हाईकोर्ट का फैसला पलटा

Vivek G.
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द प्रॉपर्टी कंपनी (पी) लिमिटेड बनाम रोहिंटन डैडी मज़दा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि CLB के पास 249 दिन की देरी माफ करने का अधिकार नहीं। शेयर ट्रांसमिशन मामले में हाईकोर्ट का फैसला पलटा।

249 दिन की देरी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: CLB को समय बढ़ाने का अधिकार नहीं, हाईकोर्ट का फैसला पलटा

नई दिल्ली की अदालत में सुनवाई के दौरान माहौल गंभीर था। Supreme Court of India ने एक पुराने लेकिन अहम कॉरपोरेट विवाद में यह स्पष्ट कर दिया कि कानून में तय समय-सीमा को हल्के में नहीं लिया जा सकता। सवाल था-क्या कंपनी लॉ बोर्ड (CLB) शेयर ट्रांसमिशन से जुड़ी अपील में देरी माफ कर सकता है? अदालत का जवाब साफ रहा।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला The Property Company (P) Ltd. और उसके एक शेयरधारक के उत्तराधिकारी रोहिंटन डैडी मज़्दा के बीच था। मृत शेयरधारक की वसीयत के आधार पर 20 शेयरों के ट्रांसमिशन की मांग की गई थी।

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कंपनी ने ट्रांसमिशन से इनकार किया। कानून के मुताबिक, ऐसी स्थिति में तय समय के भीतर अपील करनी होती है। लेकिन यहां अपील 249 दिन की देरी से दाखिल की गई।

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CLB ने देरी को माफ कर दिया। बाद में कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी CLB के इस कदम को सही ठहराया। इसके खिलाफ कंपनी सुप्रीम कोर्ट पहुंची।

अदालत का अवलोकन

सुनवाई के दौरान पीठ ने सबसे पहले यह देखा कि देरी माफ करने का अधिकार किसके पास है। अदालत ने कहा कि CLB एक अर्ध-न्यायिक निकाय है, न कि पूर्ण अदालत।

पीठ ने स्पष्ट किया कि सीमाबद्धता कानून (Limitation Act) सामान्य तौर पर केवल अदालतों पर लागू होता है, जब तक किसी विशेष कानून में साफ तौर पर यह न कहा गया हो कि वह किसी ट्रिब्यूनल या बोर्ड पर भी लागू होगा।

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अदालत ने टिप्पणी की,

“कानून में जो अधिकार स्पष्ट रूप से नहीं दिए गए हैं, उन्हें अनुमान से किसी अर्ध-न्यायिक संस्था को नहीं सौंपा जा सकता।”

एक अहम तर्क यह था कि बाद में कंपनियां अधिनियम, 2013 में संशोधन हुआ, जिससे NCLT और NCLAT को Limitation Act लागू करने की शक्ति मिली।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि यह बदलाव भविष्य के लिए था। CLB के दौर में यह शक्ति मौजूद नहीं थी।
पीठ ने कहा,

“बाद में आया कानून, पहले से लिए गए फैसलों को स्वतः वैध नहीं बना देता।”

अदालत ने यह भी माना कि उत्तराधिकारी कई साल तक निष्क्रिय रहा।

हालांकि CLB ने “न्याय के हित” में देरी माफ की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्याय का मतलब कानून से बाहर जाना नहीं होता। अगर समय-सीमा को यूं ही नजरअंदाज किया गया, तो कानून की निश्चितता खत्म हो जाएगी।

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अंतिम निर्णय

इन सभी कारणों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और कहा कि CLB के पास 249 दिन की देरी माफ करने का अधिकार नहीं था।

इसके साथ ही, देरी माफी का आदेश अवैध ठहराया गया और अपील स्वीकार कर ली गई।

Case Title: The Property Company (P) Ltd. vs. Rohinten Daddy Mazda

Case No.: Civil Appeal No. 92 of 2026

Case Type: Company Law / Share Transmission

Decision Date: 7 January 2026

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