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तलाकशुदा बेटी को पारिवारिक पेंशन का हक: कलकत्ता हाईकोर्ट ने केंद्र की याचिका खारिज की

Shivam
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भारत संघ और अन्य बनाम मीता साहा कर्मकार - कलकत्ता उच्च न्यायालय ने तलाकशुदा बेटी को पारिवारिक पेंशन देने के सीएटी के आदेश को बरकरार रखा और पेंशन नियमों के तहत केंद्र की चुनौती को खारिज कर दिया।

तलाकशुदा बेटी को पारिवारिक पेंशन का हक: कलकत्ता हाईकोर्ट ने केंद्र की याचिका खारिज की

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि यदि बेटी अपने पिता की मृत्यु के समय वास्तविक रूप से उन पर निर्भर थी, तो केवल तलाक की तारीख के आधार पर उसे पारिवारिक पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने केंद्र सरकार और रेलवे प्रशासन की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के आदेश को चुनौती दी गई थी।

यह मामला भारत का संघ बनाम मीता साहा कर्मकार से जुड़ा है, जिसमें तलाकशुदा बेटी को पारिवारिक पेंशन देने का निर्देश दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

मीता साहा कर्मकार के पिता दक्षिण-पूर्व रेलवे में कर्मचारी थे और 31 दिसंबर 1983 को सेवानिवृत्त हुए। उनकी मां का निधन 5 नवंबर 2011 को हुआ, जबकि पिता की मृत्यु 19 अप्रैल 2013 को हुई।

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मीता की शादी 12 अगस्त 1991 को हुई थी। उनके पति ने 1997 में तलाक की याचिका दायर की, जो बाद में भरण-पोषण न देने के कारण स्थगित हो गई। मीता का कहना था कि उन्हें ससुराल से निकाल दिया गया और वे 1996–97 से अपने मायके में पिता पर निर्भर रहकर रह रही थीं। बाद में उन्होंने 2014 में तलाक की अलग याचिका दायर की, जिस पर 1 सितंबर 2016 को तलाक की डिक्री हुई।

रेलवे प्रशासन ने 2022 में उनके पारिवारिक पेंशन के अनुरोध को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि तलाक माता-पिता की मृत्यु के बाद हुआ, इसलिए वे “आश्रित” नहीं मानी जा सकतीं।

CAT का फैसला

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, कोलकाता पीठ ने 9 अक्टूबर 2024 को रेलवे का आदेश रद्द कर दिया। अधिकरण ने कहा कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के 19 जुलाई 2017 के कार्यालय ज्ञापन का उद्देश्य आश्रित परिवार के सदस्य को आर्थिक सुरक्षा देना है, न कि नियमों की संकीर्ण व्याख्या करना।

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CAT ने यह भी माना कि मीता अपने पिता के जीवनकाल में ही उन पर निर्भर थीं और तलाक की प्रक्रिया भी उसी दौरान शुरू हो चुकी थी।

हाईकोर्ट में दलीलें

केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि मीता ने तलाक की याचिका माता-पिता की मृत्यु के बाद दायर की, इसलिए वे पेंशन की पात्र नहीं हैं। सरकार ने एक पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए निर्भरता पर सवाल उठाया।

वहीं, मीता की ओर से दलील दी गई कि पति द्वारा 1997 में दायर तलाक का मामला पिता के जीवनकाल में लंबित था और उन्हें वर्षों पहले ही छोड़ दिया गया था। उनके पास कोई स्वतंत्र आय नहीं थी और वे पिता पर ही आश्रित थीं।

अदालत की टिप्पणियां

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सुजय पाल और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन की पीठ ने DoPT के 19 जुलाई 2017 के ज्ञापन की व्याख्या करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य “आश्रित सदस्य को आर्थिक सहारा देना” है।

पीठ ने कहा, “यह आवश्यक नहीं है कि तलाक माता-पिता के जीवनकाल में ही अंतिम रूप ले। यदि तलाक की कार्यवाही उस समय शुरू हो चुकी थी और बेटी आश्रित थी, तो वह पारिवारिक पेंशन की पात्र होगी।”

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अदालत ने यह भी माना कि ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों से स्पष्ट है कि मीता को 1995 से ही पति ने छोड़ दिया था, जो पिता के जीवनकाल का समय था।

अंतिम निर्णय

हाईकोर्ट ने CAT के आदेश में कोई कानूनी खामी नहीं पाई और केंद्र सरकार की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि writ jurisdiction में बैठकर वह अपीलीय अदालत की तरह हस्तक्षेप नहीं कर सकती, जब तक आदेश में स्पष्ट अवैधता या गंभीर त्रुटि न हो।

इस तरह, मीता साहा कर्मकार को पारिवारिक पेंशन देने का CAT का निर्देश बरकरार रखा गया।

Case Title: Union of India & Others vs Mita Saha Karmakar

Case Number: WP.CT 36 of 2025

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