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तेलंगाना हाईकोर्ट ने प्रेम संबंध मामले में FIR रद्द की, कहा- मुकदमा जारी रखना ‘कानून का दुरुपयोग’

Vivek G.
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मधुकर एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य, तेलंगाना हाईकोर्ट ने प्रेम संबंध विवाद में दर्ज FIR रद्द की। अदालत ने कहा, समझौते के बाद मुकदमा जारी रखना कानून का दुरुपयोग।

तेलंगाना हाईकोर्ट ने प्रेम संबंध मामले में FIR रद्द की, कहा- मुकदमा जारी रखना ‘कानून का दुरुपयोग’

तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में ज़हीराबाद टाउन पुलिस स्टेशन, संगारेड्डी जिले में दर्ज आपराधिक मामले को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि जब दोनों पक्ष आपसी सहमति से विवाद सुलझा चुके हैं और शिकायतकर्ता मुकदमा आगे नहीं बढ़ाना चाहती, तो कार्यवाही जारी रखना “कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग” होगा।

यह आदेश न्यायमूर्ति तिरुमाला देवी ईडा ने क्रिमिनल पिटिशन नंबर 12373/2025 में सुनाया। मामला बीएनएस की धाराओं 69 और 318(4) के तहत दर्ज हुआ था।

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मामले की पृष्ठभूमि

एफआईआर के मुताबिक, 28 वर्षीय महिला, जो घरों में काम करती है, का आरोप था कि आरोपी नंबर-1 के साथ उसके प्रेम संबंध थे। उसने कहा था कि शादी का भरोसा देकर शारीरिक संबंध बनाए गए, लेकिन बाद में सगाई से इनकार कर दिया गया।

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इसी आधार पर ज़हीराबाद टाउन थाने में अपराध संख्या 114/2025 दर्ज हुई।

हालांकि सुनवाई के दौरान तस्वीर बदलती नजर आई। अदालत के सामने 18 सितंबर 2025 का एक समझौता ज्ञापन (MoU) रखा गया, जिसमें दोनों पक्षों ने साफ कहा कि वे आपसी सहमति से विवाद खत्म करना चाहते हैं। दस्तावेज़ में यह भी उल्लेख था कि वे एक-दूसरे की तस्वीरें और वीडियो अपने-अपने मोबाइल से हटाएंगे और भविष्य में संपर्क नहीं रखेंगे।

अदालत में क्या दलीलें दी गईं

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि संबंध सहमति से थे और आरोपी की उम्र 21 वर्ष से कम थी, इसलिए विवाह का सवाल ही नहीं उठता।

दूसरी ओर, महिला की ओर से पेश वकील ने कहा कि वह कानूनी पेचीदगियों से अनभिज्ञ है। “वह सिर्फ प्रेम संबंध में थी। सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से बात आगे नहीं बढ़ी। अब वह अपनी शादी और भविष्य को लेकर चिंतित है,” यह दलील दी गई।

राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक ने कहा कि शुरू में गंभीर आरोप थे, इसलिए केवल समझौते के आधार पर मामला खत्म नहीं किया जाना चाहिए।

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सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

सुनवाई के दौरान अदालत ने State of Madhya Pradesh v. Laxmi Narayan के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि गंभीर और जघन्य अपराधों में समझौते के आधार पर कार्यवाही रद्द नहीं की जानी चाहिए।

साथ ही, Madhukar & Ors. v. State of Maharashtra & Anr. के हालिया निर्णय का भी हवाला दिया गया, जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि यदि पक्षकारों ने आपसी सहमति से विवाद सुलझा लिया है और मुकदमा जारी रखने से कोई सार्थक परिणाम नहीं निकलेगा, तो अदालत अपने अधिकार का उपयोग कर सकती है।

न्यायमूर्ति ने टिप्पणी की, “जब शिकायतकर्ता स्वयं मुकदमा नहीं चलाना चाहती और दोनों पक्ष अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ना चाहते हैं, तो ट्रायल जारी रखना किसी के हित में नहीं होगा।”

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अदालत का निष्कर्ष और फैसला

अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता एक अशिक्षित महिला है और उसने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह आगे कार्रवाई नहीं चाहती। समझौते की शर्तें भी यह दर्शाती हैं कि दोनों पक्ष अलग-अलग रास्ते चुन चुके हैं।

न्यायमूर्ति ने कहा कि ऐसे हालात में मुकदमा चलाना केवल अदालत का समय और पक्षकारों की ऊर्जा व्यर्थ करेगा।

अंततः, अदालत ने क्रिमिनल पिटिशन स्वीकार करते हुए अपराध संख्या 114/2025 में आरोपियों के खिलाफ चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया। साथ ही लंबित अन्य याचिकाएं भी समाप्त घोषित की गईं।

Case Title: Madhukar & Ors. v. State of Maharashtra & Anr.

Case No.: Crl.P. 12373/2025

Decision Date: November 04, 2025

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