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तेलंगाना हाईकोर्ट: अनुसूचित जनजाति की महिला पर HMA लागू नहीं, ‘हिंदू रीति से पंजीकरण’ के बावजूद विवाह शून्य

Shivam
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तेलंगाना हाईकोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जनजाति की महिला पर हिंदू विवाह अधिनियम लागू नहीं होता, इसलिए HMA के तहत पंजीकृत विवाह भी शून्य है।

तेलंगाना हाईकोर्ट: अनुसूचित जनजाति की महिला पर HMA लागू नहीं, ‘हिंदू रीति से पंजीकरण’ के बावजूद विवाह शून्य

हैदराबाद में तेलंगाना हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक अहम फैसले में साफ कहा कि अगर किसी पक्ष पर हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) लागू ही नहीं होता, तो सिर्फ मंदिर में रस्में करने या उसी कानून के तहत रजिस्ट्रेशन कराने से विवाह वैध नहीं हो जाता। अदालत ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कथित विवाह को कानूनन शून्य और लागू न होने वाला घोषित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला फैमिली कोर्ट अपील नंबर 195/2014 से जुड़ा है। याचिकाकर्ता एक दंत चिकित्सा (BDS) की छात्रा थीं। उनका कहना था कि आरोपी ने पहले लगातार फोन और संदेश भेजे, फिर कथित तौर पर धमकी देकर उन्हें बस में बैठाया और अलग-अलग जगह ले जाकर जबरन दस्तखत कराए। बाद में मंदिर में फोटो खिंचवाकर विवाह घोषित किया गया। छात्रा ने इसे दबाव और डर के माहौल में हुआ बताया और कहा कि उन्होंने कभी स्वेच्छा से शादी नहीं की।

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दूसरी ओर, प्रतिवादी ने दावा किया कि दोनों में प्रेम संबंध था, सहमति से शादी हुई और साथ में तस्वीरें भी ली गईं। फैमिली कोर्ट ने पहले चरण में महिला की याचिका खारिज कर दी थी। इसी आदेश को चुनौती देकर अपील दायर की गई।

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हाईकोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या हिंदू विवाह अधिनियम इस मामले में लागू होता भी है या नहीं। याचिकाकर्ता अनुसूचित जनजाति से थीं, जबकि प्रतिवादी अनुसूचित जाति से। कानून की धारा 2(2) कहती है कि अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर यह अधिनियम तब तक लागू नहीं होगा, जब तक केंद्र सरकार इसकी अधिसूचना जारी न करे।

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बेंच ने इस बिंदु पर साफ कहा कि “किसी कानून की लागू-योग्यता पक्षकारों की इच्छा या किसी रस्म से तय नहीं होती, बल्कि विधायी प्रावधान से तय होती है।” अदालत ने यह भी जोड़ा कि अगर किसी हिंदू को ऐसे व्यक्ति से विवाह करना है जिस पर HMA लागू नहीं होता, तो सही रास्ता विशेष विवाह अधिनियम, 1954 है।

कोर्ट की टिप्पणियाँ

फैसले में अदालत ने कहा, “केवल मंदिर में विवाह करना या हिंदू विवाह अधिनियम के तहत पंजीकरण करा लेना उस विवाह को वैध नहीं बना देता, जिस पर यह कानून लागू ही नहीं होता।” कोर्ट ने यह भी नोट किया कि इस मामले में न तो यह कहा गया और न ही साबित किया गया कि महिला ने अपनी जनजातीय परंपराएं छोड़ दी थीं या पूरी तरह हिंदू व्यक्तिगत कानून के अधीन आ गई थीं।

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बेंच ने यह भी माना कि फैमिली कोर्ट ने एक मूल सवाल क्या यह कानून लागू होता है या नहीं तय किए बिना ही मामले का निपटारा कर दिया, जो एक “क्षेत्राधिकार की गंभीर गलती” है।

फैसला

हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली, फैमिली कोर्ट का 11 जुलाई 2014 का आदेश रद्द कर दिया और घोषित किया कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत इस कथित विवाह को न तो मान्यता दी जा सकती है और न ही लागू किया जा सकता है। यानी, कानून की नजर में यह विवाह शून्य है।

Case Title:- X & Y

Case Number:- Family Court Appeal No. 195 of 2014

Bench: Justice K. Lakshman and Justice Vakiti Ramakrishna Reddy

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