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मंदिर का पुजारी ‘वर्कमैन’ नहीं: गुजरात हाईकोर्ट ने कहा-धार्मिक सेवा औद्योगिक कार्य नहीं मानी जाएगी

Vivek G.
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उमेश्वर अक्षयवर दुबे बनाम श्री साईनाथ सार्वजनिक सेवा मंडल ट्रस्ट एवं अन्य। गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि मंदिर में पूजा करने वाला पुजारी औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत “वर्कमैन” नहीं है, इसलिए श्रम विवाद लागू नहीं होंगे।

मंदिर का पुजारी ‘वर्कमैन’ नहीं: गुजरात हाईकोर्ट ने कहा-धार्मिक सेवा औद्योगिक कार्य नहीं मानी जाएगी

गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि मंदिर में पूजा-अर्चना करने वाला पुजारी औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत “वर्कमैन” नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि मंदिर का मूल उद्देश्य धार्मिक और आध्यात्मिक सेवाएं देना है, इसलिए वहां कार्यरत पुजारी का काम औद्योगिक श्रेणी में नहीं आता।

यह फैसला जस्टिस भर्गव डी. करिया और जस्टिस एल. एस. पिरजादा की खंडपीठ ने 16 फरवरी 2026 को सुनाया।

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मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता उमेश्वर अक्षयवर दुबे 10 मार्च 1999 से एक मंदिर में पुजारी के रूप में कार्यरत थे। उन्हें पूजा-अर्चना और आरती करने के बदले प्रारंभ में 1200 रुपये मासिक मानदेय दिया जाता था।

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दुबेजी का कहना था कि मंदिर ट्रस्ट केवल धार्मिक गतिविधियां ही नहीं, बल्कि लड्डू, नारियल और पूजा सामग्री बेचने जैसी गतिविधियां भी करता है। ट्रस्ट में करीब 35-40 कर्मचारी काम करते थे, जिनमें पुजारी, मैनेजर, रसोइये और अन्य कर्मचारी शामिल थे।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि 30 नवंबर 2012 को उनकी सेवा बिना नोटिस और बिना मुआवजा दिए समाप्त कर दी गई, जो कानून और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। इसके बाद उन्होंने श्रम विभाग में शिकायत दर्ज कराई और मामला लेबर कोर्ट नवसारी को भेजा गया।

लेबर कोर्ट ने पहले यह प्रारंभिक प्रश्न तय किया कि क्या पुजारी को “वर्कमैन” माना जा सकता है।

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सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि पुजारी का कार्य मैनुअल, तकनीकी, क्लेरिकल या औद्योगिक कार्य की श्रेणी में नहीं आता, जो कि औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2(s) में परिभाषित है।

इस आधार पर लेबर कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता “वर्कमैन” नहीं हैं और इसलिए श्रम न्यायालय को विवाद सुनने का अधिकार नहीं है।

बाद में हाईकोर्ट के सिंगल जज ने भी इस निर्णय को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी।

अपील में याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि मंदिर ट्रस्ट धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ व्यावसायिक गतिविधियां भी करता है, इसलिए उसे “इंडस्ट्री” माना जाना चाहिए।

उनकी ओर से कहा गया कि जब संस्था उद्योग मानी जाएगी तो पुजारी भी “वर्कमैन” की श्रेणी में आएंगे और उन्हें श्रम कानूनों का संरक्षण मिलना चाहिए।

दूसरी ओर, ट्रस्ट के वकील ने दलील दी कि मंदिर का मुख्य उद्देश्य आध्यात्मिक सेवा है और इसे उद्योग नहीं कहा जा सकता। इसलिए वहां काम करने वाले पुजारी औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत “वर्कमैन” नहीं हो सकते।

खंडपीठ ने कहा कि किसी संस्था को “इंडस्ट्री” मानने के लिए उसकी मुख्य गतिविधि देखी जाती है।

अदालत ने कहा:

“जब किसी मंदिर का प्रमुख उद्देश्य श्रद्धालुओं को धार्मिक और आध्यात्मिक सेवाएं प्रदान करना है, तब उसे औद्योगिक गतिविधि नहीं माना जा सकता।”

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कोर्ट ने यह भी कहा कि औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत “वर्कमैन” वही व्यक्ति होता है जो मैनुअल, तकनीकी, ऑपरेशनल, क्लेरिकल या सुपरवाइजरी कार्य करता हो।

“पुजारी का कार्य इन श्रेणियों में नहीं आता, इसलिए उसे ‘वर्कमैन’ नहीं कहा जा सकता।”

सभी तथ्यों और कानून पर विचार करने के बाद गुजरात हाईकोर्ट ने पाया कि लेबर कोर्ट और सिंगल जज का निर्णय सही था।

अदालत ने कहा कि मंदिर का प्रमुख उद्देश्य धार्मिक गतिविधियां हैं और ऐसे संस्थान को औद्योगिक संस्था नहीं माना जा सकता।

इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मंदिर में पूजा-अर्चना करने वाला पुजारी औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत “वर्कमैन” की परिभाषा में नहीं आता।

अंततः हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखा।

Case Title: Umeshwar Akshaywar Dubey vs Shree Sainath Sarvajanik Seva Mandal Trust & Anr.

Case No.: Letters Patent Appeal No. 2319 of 2017

Decision Date: 16 February 2026

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