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कमाई-आय का हलफनामा नहीं दिया तो अदालत ने मानी बात छिपाई: पति की रिविजन खारिज, ₹3,500 अंतरिम भरण-पोषण बरकरार

Vivek G.
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श्याम मोहन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी को ₹3,500 अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश बरकरार रखा, आय हलफनामा न देने पर पति पर प्रतिकूल अनुमान।

कमाई-आय का हलफनामा नहीं दिया तो अदालत ने मानी बात छिपाई: पति की रिविजन खारिज, ₹3,500 अंतरिम भरण-पोषण बरकरार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी को दिए गए ₹3,500 प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि जब पति आय और संपत्ति का खुलासा करने वाला हलफनामा दाखिल नहीं करता, तो अदालत उसके खिलाफ प्रतिकूल अनुमान (adverse inference) लगा सकती है।

यह फैसला क्रिमिनल रिविजन में सुनाया गया, जिसमें पति ने फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी।

मामले की पृष्ठभूमि

पत्नी ने धारा 125 Cr.P.C. के तहत भरण-पोषण की अर्जी लगाई थी। उसके मुताबिक शादी 14 जून 2020 को हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी।

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पत्नी का आरोप था कि दहेज की मांग के चलते उसे 14 मार्च 2022 से मायके में रहने को मजबूर होना पड़ा और तब से पति ने कोई खर्च नहीं दिया।

पत्नी ने अदालत से ₹15,000 प्रति माह पढ़ाई, रोजमर्रा और मेडिकल खर्च के लिए तथा ₹2,000 प्रति माह मुकदमे के खर्च के लिए मांगे थे।

पत्नी ने क्या दावा किया

पत्नी ने अदालत में अपना आय, संपत्ति और शिक्षा संबंधी हलफनामा दाखिल किया और बताया कि वह बेरोजगार है।

उसने दावा किया कि पति के पास:

• 75 बीघा कृषि भूमि है,

• वह पट्टे पर खेती करता है,

• और प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग चलाता है,

जिससे उसकी कमाई लगभग ₹40,000 प्रति माह है।

पति की दलील

पति की तरफ से कहा गया कि:

• उसके पास आय का कोई स्रोत नहीं है,

• वह कोचिंग नहीं चलाता,

• और उसके नाम कोई जमीन रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है।

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इसके अलावा, पति ने यह भी तर्क दिया कि पत्नी पढ़ी-लिखी है और अपना खर्च खुद उठा सकती है।

उसने पत्नी की मार्कशीट दिखाकर बताया कि पत्नी ने 2011 में M.A. और 2024 में L.L.B. पूरी कर ली है।

कोर्ट की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि अंतरिम भरण-पोषण के मामलों में यदि पति को अवसर मिलने के बावजूद आय और संपत्ति का हलफनामा दाखिल नहीं करता, तो अदालत उसके खिलाफ प्रतिकूल अनुमान लगा सकती है।

कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि ऐसे मामलों में फैमिली कोर्ट द्वारा Assets & liabilities disclosure affidavit पर भरोसा करना जरूरी है ताकि आय छिपाने या गलत जानकारी देने की संभावना कम हो।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरिम भरण-पोषण की राशि तय करते समय शुरुआती स्तर पर “एकदम सटीक गणितीय हिसाब” जरूरी नहीं होता।

फैसले में कहा गया कि पत्नी ने L.L.B. की पढ़ाई 2024 में पूरी की, इसलिए उसके शिक्षा खर्च का दावा प्रथम दृष्टया सही माना जा सकता है।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर यह भी नोट किया कि पति यह साबित नहीं कर पाया कि पत्नी के पास कोई कमाई का स्रोत है या वह किसी लाभकारी नौकरी/काम में लगी हुई है।

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कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट का आदेश कानूनन सही है और इसमें कोई “खामी” नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि पत्नी को “सम्मानजनक जीवन स्तर” बनाए रखने के लिए आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए और ₹3,500 प्रति माह की राशि न तो ज्यादा है और न ही अनुचित।

इसके बाद अदालत ने पति की क्रिमिनल रिविजन खारिज कर दी और अंतरिम भरण-पोषण का आदेश बरकरार रखा।

साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतिम सुनवाई में ट्रायल कोर्ट इस आदेश में की गई टिप्पणियों से प्रभावित न हो।

Case Title: Shyam Mohan vs State of U.P. and Another

Case No.: Criminal Revision No. 4929 of 2024

Decision Date: January 19, 2026

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