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हाईकोर्ट ने केवल एक मुद्दे पर फैसला देकर की गलती, सुप्रीम कोर्ट ने रिमांड आदेश रद्द किया

Vivek G.
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हेमलता एकनाथ पिसे बनाम शुभम बहू उद्देशीय संस्था, वढमना और अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रिमांड आदेश रद्द किया, कहा सभी मुद्दों पर कारण सहित फैसला जरूरी। शिक्षिका बर्खास्तगी मामला।

हाईकोर्ट ने केवल एक मुद्दे पर फैसला देकर की गलती, सुप्रीम कोर्ट ने रिमांड आदेश रद्द किया

नई दिल्ली में बुधवार (11-02-2026) को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की-“न्याय केवल एक बिंदु पर टिक कर नहीं किया जा सकता।” अदालत ने साफ कहा कि जब किसी मामले में कई सवाल उठते हैं, तो कोर्ट को हर मुद्दे पर कारण सहित विचार करना चाहिए।

मामला एक शिक्षिका की बर्खास्तगी और पुनर्नियुक्ति से जुड़ा है, जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ के आदेश को चुनौती दी गई थी।

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मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता हेमलता एकनाथ पिसे को उनके संस्थान, शुबहम बहुउद्देशीय संस्था, वडधामना ने सेवा से बर्खास्त कर दिया था। इसके खिलाफ उन्होंने स्कूल ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया।

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ट्रिब्यूनल ने 8 अगस्त 2019 को बर्खास्तगी का आदेश रद्द करते हुए उन्हें सेवा में बहाल करने और सभी लाभ देने का निर्देश दिया था ।

हालांकि, संस्था ने इस आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 5 सितंबर 2024 को ट्रिब्यूनल का फैसला रद्द करते हुए मामला फिर से ट्रिब्यूनल को भेज दिया।

हाईकोर्ट का कहना था कि ट्रिब्यूनल ने उस प्रस्ताव (रिज़ॉल्यूशन) पर विचार नहीं किया, जिसके जरिए संस्था के सचिव को अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने का अधिकार दिया गया था।

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शिक्षिका का पक्ष

अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की। उनका तर्क था कि विभागीय जांच “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों” के खिलाफ हुई।

उन्होंने कहा कि उन्हें सभी गवाहों से जिरह (क्रॉस-एग्ज़ामिनेशन) करने का पूरा मौका नहीं दिया गया। 31 जुलाई 2017 को प्रबंधन के मुख्य गवाह से जिरह चल रही थी, जिसे अगली तारीख तक स्थगित किया गया। लेकिन 1 अगस्त 2017 को जांच अधिकारी ने अचानक कार्यवाही बंद कर दी।

उनका कहना था कि ट्रिब्यूनल ने इन पहलुओं पर विचार करते हुए आरोपों को सिद्ध नहीं माना था।

फिर भी, हाईकोर्ट ने 25 सितंबर 2024 को पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी ।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान साफ कहा कि हाईकोर्ट ने “केवल एक बिंदु” पर ध्यान केंद्रित कर बाकी मुद्दों को अनदेखा किया।

पीठ ने कहा, “जब किसी मामले में कई सवाल उठते हैं, तो अदालत को हर एक पर कारण सहित विचार करना चाहिए। केवल एक निर्णायक बिंदु पर फैसला देना उचित नहीं है।”

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि भले ही सचिव को कार्रवाई शुरू करने का अधिकार था या नहीं, यह महत्वपूर्ण था, लेकिन यह भी देखना जरूरी था कि क्या जांच प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार हुई और क्या ट्रिब्यूनल के निष्कर्ष सही थे।

अदालत ने कहा कि सभी मुद्दों पर विचार न करना “मूलभूत त्रुटि” है, जिससे हाईकोर्ट का आदेश प्रभावित हो गया।

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अदालत का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 5 सितंबर 2024 और 25 सितंबर 2024 के हाईकोर्ट के दोनों आदेश रद्द कर दिए। साथ ही, रिट याचिका को फिर से हाईकोर्ट को भेज दिया, ताकि वह सभी दावों और बचावों पर समग्र रूप से विचार करे ।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता अब सेवानिवृत्त हो चुकी हैं, इसलिए पुनर्नियुक्ति का सवाल नहीं उठता। अब हाईकोर्ट को मुख्य रूप से यह तय करना होगा कि क्या ट्रिब्यूनल ने अनुशासनात्मक कार्रवाई में हस्तक्षेप सही किया था, और यदि संस्था गलत पाई जाती है, तो क्या अपीलकर्ता को बकाया वेतन और सेवानिवृत्ति लाभ मिलेंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि मामले को संबंधित पीठ के समक्ष जल्द सूचीबद्ध किया जाए और चार महीने के भीतर निर्णय किया जाए।

इन टिप्पणियों के साथ अपीलें स्वीकार कर ली गईं।

Case Title: Hemlata Eknath Pise vs Shubham Bahu-Uddeshiya Sanstha Waddhamna & Ors.

Case No.: Civil Appeal Nos. 1558-1559 of 2026

Decision Date: February 11, 2026

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