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13 साल से कोमा में पड़े युवक के मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, PEG ट्यूब हटाने की अनुमति; ‘प्राकृतिक मृत्यु’ का रास्ता खुला

Vivek G.
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हरीश राणा बनाम भारत संघ और अन्य, सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से वेजिटेटिव अवस्था में पड़े हरीश राणा मामले में PEG ट्यूब हटाने की अनुमति दी, कहा-गरिमापूर्ण मृत्यु भी अनुच्छेद 21 का हिस्सा।

13 साल से कोमा में पड़े युवक के मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, PEG ट्यूब हटाने की अनुमति; ‘प्राकृतिक मृत्यु’ का रास्ता खुला

करीब 13 वर्षों से स्थायी वेजिटेटिव अवस्था (Permanent Vegetative State) में जीवन जी रहे युवक हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने चिकित्सकीय राय और परिवार की इच्छा को ध्यान में रखते हुए कृत्रिम पोषण और तरल पदार्थ देने वाली PEG ट्यूब हटाने (CANH withdrawal) की अनुमति दे दी।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब उपचार से कोई सुधार संभव न हो और वह केवल जीवन को कृत्रिम रूप से लंबा कर रहा हो, तब ऐसे उपचार को हटाना “पैसिव यूथेनेशिया” के दायरे में आ सकता है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार से जुड़ा है।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 32 वर्षीय हरीश राणा से जुड़ा है, जो वर्ष 2013 में पंजाब विश्वविद्यालय में बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। उसी दौरान वह अपने पीजी आवास की चौथी मंजिल से गिर गए, जिससे उन्हें गंभीर मस्तिष्क चोट (Diffuse Axonal Injury) लगी।

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दुर्घटना के बाद उनका इलाज कई अस्पतालों में चला, जिनमें पीजीआई चंडीगढ़ और एम्स दिल्ली शामिल हैं। चिकित्सा रिपोर्टों के अनुसार, दुर्घटना के बाद से वह लगातार स्थायी वेजिटेटिव अवस्था (PVS) में हैं और किसी प्रकार की जागरूक प्रतिक्रिया नहीं देते।

उनकी स्थिति इतनी गंभीर है कि उन्हें सांस लेने के लिए ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब और भोजन के लिए PEG ट्यूब के माध्यम से कृत्रिम पोषण और हाइड्रेशन (CANH) दिया जाता रहा है।

डॉक्टरों ने भी प्रमाणित किया कि उन्हें 100 प्रतिशत स्थायी शारीरिक अक्षमता है और उनके ठीक होने की संभावना बेहद कम है।

दिल्ली हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक

हरीश राणा के माता-पिता ने पहले दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर यह मांग की थी कि उनके बेटे के उपचार और जीवन-रक्षक साधनों को लेकर निर्णय लिया जाए।

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हालांकि हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि मरीज मशीनों के सहारे जीवित नहीं है, इसलिए न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक नहीं है।

इसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। पहले आदेश में अदालत ने सरकार को घर पर देखभाल उपलब्ध कराने का निर्देश दिया और आगे जरूरत पड़ने पर पुनः अदालत आने की छूट दी। बाद में स्थिति में कोई सुधार न होने पर परिवार ने पुनः अदालत से हस्तक्षेप की मांग की।

मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के लिए दो मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया।

प्राथमिक मेडिकल बोर्ड, जिसमें न्यूरोलॉजिस्ट, न्यूरोसर्जन और अन्य विशेषज्ञ शामिल थे, ने मरीज की जांच के बाद बताया कि वह वर्षों से स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में है और उसके ठीक होने की संभावना नगण्य है।

इसके बाद एम्स द्वारा गठित द्वितीयक मेडिकल बोर्ड ने भी विस्तृत परीक्षण के बाद कहा कि:

“रोगी को गंभीर मस्तिष्क क्षति हुई है और वह पिछले 13 वर्षों से स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में है। कृत्रिम पोषण और हाइड्रेशन से उसका जीवन बना रह सकता है, लेकिन इससे उसकी स्थिति में सुधार संभव नहीं है।”

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परिवार की पीड़ा और अदालत के समक्ष बयान

सुनवाई के दौरान हरीश राणा के माता-पिता और भाई-बहन अदालत के सामने पेश हुए। उन्होंने बताया कि पिछले 13 वर्षों से उन्होंने हर संभव इलाज कराया, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ।

परिवार ने अदालत से भावुक अपील करते हुए कहा कि अगर इलाज से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है, तो केवल कृत्रिम तरीकों से जीवन लंबा करना उचित नहीं है।

उनका कहना था कि यह निर्णय बेटे के सम्मान और गरिमा को ध्यान में रखते हुए लिया जा रहा है।

अदालत की कानूनी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 2018 के Common Cause फैसले का हवाला देते हुए कहा कि:

“पैसिव यूथेनेशिया यानी जीवन-रक्षक उपचार को हटाना या रोकना, तब वैध हो सकता है जब उपचार केवल जीवन को कृत्रिम रूप से बढ़ा रहा हो और मरीज के हित में न हो।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सक्रिय यूथेनेशिया (किसी कार्रवाई से मृत्यु देना) भारतीय कानून में स्वीकार्य नहीं है, लेकिन फिजूल या निरर्थक चिकित्सा उपचार को हटाना ‘प्राकृतिक मृत्यु को होने देना’ माना जाएगा।

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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सभी मेडिकल रिपोर्टों, डॉक्टरों की राय और परिवार की इच्छा को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि मरीज के लिए जीवन-रक्षक उपचार जारी रखना उसके सर्वोत्तम हित में नहीं है।

अदालत ने निर्देश दिया कि PEG ट्यूब के माध्यम से दिए जा रहे कृत्रिम पोषण और हाइड्रेशन (CANH) को हटाया जा सकता है, और सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि मरीज को इस प्रक्रिया के दौरान उचित पालीएटिव (दर्द कम करने वाली) देखभाल उपलब्ध हो।

Case Title: Harish Rana v. Union of India & Others

Case No.: Miscellaneous Application No. 2238 of 2025 in SLP (Civil) No. 18225 of 2024

Decision Date: 11 March 2026

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