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सुप्रीम कोर्ट ने पारिवारिक ज़मीन विवाद में हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया, डोरैराज की अपील खारिज

Vivek G.
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दोराईराज बनाम दोरैसामी (एलआर और अन्य के माध्यम से), सुप्रीम कोर्ट ने पारिवारिक संपत्ति विवाद में मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया, डोरैराज की अपील खारिज की।

सुप्रीम कोर्ट ने पारिवारिक ज़मीन विवाद में हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया, डोरैराज की अपील खारिज

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की अदालत में जब यह मामला सुना गया, तो साफ दिख रहा था कि विवाद सिर्फ ज़मीन का नहीं, बल्कि तीन पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक खींचतान का है। तमिलनाडु के पेरम्बलूर और तिरुचिरापल्ली ज़िले की कृषि भूमि को लेकर चला यह मुकदमा आखिरकार अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँचा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एक हिंदू संयुक्त परिवार की 79 संपत्तियों के बंटवारे से जुड़ा है। परिवार के साझा पूर्वज पल्लिकूडाथन थे, जिनके तीन बेटे थे। विवाद मुख्य रूप से सेनगन के बेटों - दुरैसामी (वादी) और डोरैराज (प्रतिवादी) - के बीच था।

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दुरैसामी ने 1987 में अदालत का दरवाज़ा खटखटाया और दावा किया कि सभी संपत्तियाँ संयुक्त पारिवारिक हैं और उन्हें उनका हिस्सा मिलना चाहिए। दूसरी ओर, डोरैराज का कहना था कि कई ज़मीनें उनके पिता और उन्होंने खुद अपनी निजी आमदनी से खरीदी थीं, इसलिए वे साझा संपत्ति नहीं हो सकतीं।

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निचली अदालतों के फैसले

ट्रायल कोर्ट ने कुछ संपत्तियों को संयुक्त मानते हुए दुरैसामी को हिस्सा दिया, जबकि कुछ ज़मीनों को बाहर कर दिया। इसके बाद जिला अदालत ने हिस्सेदारी को 5/16 कर दिया। मामला जब मद्रास हाईकोर्ट पहुँचा, तो वहाँ भी ज़्यादातर निष्कर्ष बरकरार रखे गए, बस कुछ संपत्तियाँ डोरैराज की निजी मानते हुए बाहर कर दी गईं।

डोरैराज ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उनकी दलील थी कि परिवार के पास कोई ऐसा पुख्ता “संयुक्त पारिवारिक आय का स्रोत” नहीं था, जिससे बाकी संपत्तियाँ खरीदी जा सकें। उन्होंने यह भी कहा कि उनके पिता सेनगन और वे खुद अलग-अलग कामों से अच्छी कमाई करते थे।

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लेकिन अदालत ने रिकॉर्ड खंगालते हुए पाया कि परिवार की कुछ ज़मीनें पैतृक थीं और उनसे खेती की नियमित आय होती थी। पीठ ने कहा कि सिर्फ यह दिखा देना काफी नहीं कि परिवार संयुक्त था, लेकिन जब पैतृक ज़मीन से आय साबित हो जाए और उसी दौरान नई संपत्तियाँ खरीदी जाएँ, तो उन्हें संयुक्त मानने का आधार बनता है।

अदालत की टिप्पणियाँ

पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जब संयुक्त परिवार के पास आय देने वाली पैतृक संपत्ति मौजूद हो और उसी समय नई ज़मीनें खरीदी गई हों, तो यह साबित करने की ज़िम्मेदारी उस व्यक्ति पर होती है जो उन्हें निजी संपत्ति बताता है।”

अदालत ने यह भी गौर किया कि जिन वर्षों में डोरैराज ने निजी कमाई का दावा किया, उस समय वे पढ़ाई कर रहे थे। ऐसे में बड़ी ज़मीनें खरीदने की क्षमता पर सवाल उठना स्वाभाविक था।

मामले में सेनगन की मृत्यु से तीन दिन पहले बनाई गई एक वसीयत भी विवाद का विषय बनी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से सहमति जताते हुए कहा कि वसीयत के हालात संदिग्ध थे - न हस्ताक्षर थे, सिर्फ अंगूठे का निशान था, और इसे लिखने वाला भी करीबी रिश्तेदार था। इसलिए इसे मान्य नहीं माना गया।

इसी तरह, कुछ ज़मीनों की बिक्री को अदालत ने पारिवारिक ज़रूरत के नाम पर सही ठहराया, लेकिन हर सौदे की अलग-अलग जाँच की गई।

अंतिम निर्णय

सभी दलीलें सुनने और दस्तावेज़ देखने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि हाईकोर्ट का फैसला तर्कसंगत और सबूतों पर आधारित है। कुछ सीमित संशोधनों को छोड़कर उसमें दखल देने का कोई कारण नहीं है।

अदालत ने डोरैराज की अपील खारिज कर दी और कहा,“हमें हाईकोर्ट के फैसले से अलग राय लेने का कोई आधार नहीं दिखता।”

इसके साथ ही दशकों पुराना यह पारिवारिक ज़मीन विवाद सुप्रीम कोर्ट में समाप्त हो गया।

Case Title: Dorairaj vs Doraisamy (Through LRs & Ors.)

Case No.: Civil Appeal Nos. 2129–2130 of 2012

Decision Date: 05 February 2026

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