Logo

सुप्रीम कोर्ट ने बलकिशन हत्या मामले में दोषियों की उम्रकैद बरकरार रखी, अपील खारिज कर तुरंत आत्मसमर्पण का आदेश

Vivek G.
Add Court Book as a preferred source on Google

डबलू और अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य, सुप्रीम कोर्ट ने बलकिशन हत्या मामले में चार दोषियों की उम्रकैद बरकरार रखी, कहा-अवैध जमावड़े का हिस्सा होने से सभी आरोपी समान रूप से जिम्मेदार।

सुप्रीम कोर्ट ने बलकिशन हत्या मामले में दोषियों की उम्रकैद बरकरार रखी, अपील खारिज कर तुरंत आत्मसमर्पण का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के बहुचर्चित बलकिशन हत्या मामले में दोषी ठहराए गए चार आरोपियों की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए उनकी अपीलें खारिज कर दीं। अदालत ने कहा कि सभी आरोपी एक “अवैध जमावड़े” का हिस्सा थे और उनका साझा उद्देश्य हत्या करना था, इसलिए भले ही हर आरोपी का अलग-अलग प्रत्यक्ष कृत्य सिद्ध न हो, फिर भी भारतीय दंड संहिता की धारा 149 के तहत वे सभी समान रूप से जिम्मेदार हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह घटना 3 जून 2000 की सुबह मध्य प्रदेश के तिहुली बस स्टैंड पर हुई थी। उस दिन बलकिशन, जो वाटरशेड कमेटी के अध्यक्ष थे, बस स्टैंड पर बैठक में जाने के लिए इंतजार कर रहे थे।

Read also:-दिल्ली हाईकोर्ट में लंच पर संकट: एलपीजी की कमी से कैंटीन में बिरयानी-दाल मखनी बंद

इसी दौरान छह आरोपी बस से उतरकर वहां पहुंचे और उनके पास आग्नेयास्त्र थे। मुख्य आरोपी विक्रम के पास माउजर, गोविंद सिंह के पास डबल बैरल बंदूक, विनोद उर्फ अजय के पास सिंगल बैरल बंदूक और अन्य आरोपियों के पास देसी कट्टे थे।

Court Book subscription: bare acts, legal drafts, court judgments and ad-free legal news, plans from ₹30/month

अभियोजन के अनुसार विक्रम ने सबसे पहले ट्रैक्टर-ट्रॉली के पीछे से गोली चलाई जो बलकिशन के हाथ में लगी। घायल होने के बाद बलकिशन जान बचाने के लिए गांव की ओर भागे, लेकिन आरोपी उनका पीछा करते रहे।

वह रतनलाल के घर में घुस गए, लेकिन आरोपियों ने उन्हें वहां से खींचकर आंगन में लाया और नजदीक से गोली मार दी, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई।

घटना के कुछ ही समय बाद मृतक के भाई बुधाराम ने पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कराई।

ट्रायल और हाईकोर्ट का फैसला

मामले की जांच के बाद आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया। ट्रायल कोर्ट ने चार आरोपियों-डब्लू, कमलेश, प्रताप नारायण और विनोद-को भारतीय दंड संहिता की धारा 148 और 302/149 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।

Read also:-ईडी अधिकारियों पर दर्ज FIR को चुनौती: झारखंड हाईकोर्ट ने रोस्टर आपत्ति खारिज की, कहा-न्यायिक कर्तव्य से पीछे हटना उचित नहीं

हालांकि उन्हें अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के आरोपों से बरी कर दिया गया।

बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी 9 नवंबर 2010 के अपने फैसले में ट्रायल कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा और दोषियों की अपीलें खारिज कर दीं।

आरोपियों की दलीलें

सुप्रीम कोर्ट में अपील करते हुए आरोपियों ने कहा कि घटना दो हिस्सों में बताई गई है—पहला बस स्टैंड पर गोली चलने का और दूसरा रतनलाल के घर में हुई फायरिंग का।

उनकी ओर से यह तर्क दिया गया कि दूसरे हिस्से का कोई भरोसेमंद प्रत्यक्षदर्शी नहीं है। स्वतंत्र गवाह रतनलाल ने भी कहा कि उन्होंने केवल गोली चलने की आवाज सुनी थी, लेकिन आरोपियों को घर के अंदर नहीं देखा।

बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि अभियोजन के गवाह मृतक के रिश्तेदार हैं और उनकी गवाही में विरोधाभास है। साथ ही हथियारों की बरामदगी और फोरेंसिक साक्ष्य भी आरोपियों की संलिप्तता को स्पष्ट रूप से साबित नहीं करते।

Read also:-सुप्रीम कोर्ट: अधूरे सबूतों के कारण 2010 के हत्या मामले में पूरनमल को बरी कर दिया गया।

राज्य का पक्ष

राज्य की ओर से दलील दी गई कि मृतक और मुख्य आरोपी विक्रम के बीच लंबे समय से राजनीतिक दुश्मनी थी। पंचायत चुनाव में मृतक की पत्नी ने विक्रम की पत्नी को हराया था, जिससे दोनों परिवारों में तनाव था।

सरकार के वकील ने अदालत को बताया कि सभी आरोपी एक ही बस से उतरकर हथियारों के साथ आए थे। यह दर्शाता है कि वे पहले से ही एक साझा योजना के तहत वहां पहुंचे थे।

अभियोजन ने यह भी कहा कि बस स्टैंड पर पहली गोली चलने के बाद सभी आरोपियों ने मिलकर मृतक का पीछा किया और बाद में घर के आंगन में कई गोलियां चलीं, जिससे उसकी मौत हो गई।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य यह साबित करते हैं कि आरोपी हथियारों के साथ एक साथ आए थे और एक अवैध जमावड़े का हिस्सा थे।

पीठ ने कहा, “जब आरोपी हथियारों से लैस होकर एक साथ पहुंचे और घटना के दौरान मृतक का पीछा किया, तो यह स्पष्ट है कि उनका साझा उद्देश्य था। ऐसी स्थिति में धारा 149 आईपीसी लागू होती है।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी आरोपी के खिलाफ अलग-अलग प्रत्यक्ष कृत्य साबित होना आवश्यक नहीं है। यदि वह अवैध जमावड़े का हिस्सा है और अपराध उसी उद्देश्य से किया गया है, तो सभी सदस्य जिम्मेदार माने जाएंगे।

Read also:-चेक बाउंस केस में बड़ी टिप्पणी: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की, ट्रायल टालने की कोशिश बताया;

चिकित्सकीय और अन्य साक्ष्य

पोस्ट-मार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृतक के शरीर पर कई गोली के घाव पाए गए। डॉक्टर ने बताया कि शरीर से लगभग 40 छर्रे निकाले गए और ये सभी चोटें आग्नेयास्त्र से लगी थीं।

अदालत ने माना कि मेडिकल रिपोर्ट और घटनास्थल से मिले खाली कारतूस अभियोजन के संस्करण को मजबूत करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।

पीठ ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि आरोपी अवैध जमावड़े का हिस्सा थे और सामूहिक रूप से हत्या के लिए जिम्मेदार हैं।

इसके साथ ही अदालत ने सभी अपीलें खारिज कर दीं और दोषियों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी।

चूंकि आरोपी फिलहाल जमानत पर थे, इसलिए अदालत ने उन्हें तुरंत आत्मसमर्पण कर बाकी सजा भुगतने का निर्देश दिया।

Case Title: Dablu & Ors. vs State of Madhya Pradesh

Case No.: Criminal Appeal Nos. 1819–1821 of 2011 & Criminal Appeal No. 1176 of 2012

Decision Date: 11 March 2026

Download Judgment

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Get it on Google PlayDownload on the App Store
Join the Court Book WhatsApp channel for latest judgments, notifications, legal news and exam updates