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सुप्रीम कोर्ट का साफ संदेश: कब्जे का दावा तभी, जब याचिका में पूरी और ठोस जानकारी हो

Vivek G.
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कांता और अन्य बनाम सोमा देवी (मृत) एलआर के माध्यम से, सुप्रीम कोर्ट ने जमीन विवाद में कहा-कब्जे की मांग तभी मान्य जब याचिका में पूरा विवरण हो। अधूरी pleadings पर राहत नहीं।

सुप्रीम कोर्ट का साफ संदेश: कब्जे का दावा तभी, जब याचिका में पूरी और ठोस जानकारी हो

सुप्रीम कोर्ट में जमीन से जुड़े एक पुराने पारिवारिक विवाद पर सुनवाई के दौरान अदालत का रुख काफी स्पष्ट दिखा। अदालत ने कहा कि केवल नाम दर्ज होना या हिस्सा बताना काफी नहीं है। अगर कोई व्यक्ति जमीन पर कब्जे या दोबारा कब्जा चाहता है, तो उसे अपनी याचिका में पूरा ब्यौरा देना होगा। यह मामला हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले की कृषि भूमि से जुड़ा था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मूल रूप से गांव लोहरा, तहसील अंब, जिला ऊना की करीब 8 कनाल 5 मरला जमीन को लेकर शुरू हुआ। सबसे पहले यह मुकदमा साल 1990 में दायर किया गया था।

मूल वादी श्याम सुंदर ने अदालत से मांग की थी कि प्रतिवादी उनकी जमीन में दखल न दें। बाद में उन्होंने याचिका में संशोधन कर जमीन का कब्जा वापस दिलाने की मांग भी जोड़ दी।

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वादी का कहना था कि वह जमीन का मालिक और सह-हिस्सेदार है, जबकि प्रतिवादी का इस पर कोई हक नहीं। वहीं, प्रतिवादी सोमादेवी की तरफ से दावा किया गया कि यह जमीन उन्हें पति की मृत्यु के बाद भरण-पोषण के बदले दी गई थी।

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ट्रायल कोर्ट से हाईकोर्ट तक

ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों को देखते हुए वादी की याचिका खारिज कर दी। इसके बाद पहला अपील कोर्ट वादी के पक्ष में गया, लेकिन मामला फिर हाईकोर्ट पहुंचा।

हाईकोर्ट ने साफ कहा कि भरण-पोषण के बदले मिली जमीन पर सोमादेवी का अधिकार हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) के तहत पूर्ण स्वामित्व में बदल चुका है।

हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि वादी ने वसीयत (Will) का तर्क बहुत देर से उठाया, जो मूल याचिका में था ही नहीं।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट में वादी की ओर से दलील दी गई कि उनका नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है और उन्हें कम से कम अपने हिस्से का कब्जा मिलना चाहिए।

वहीं, प्रतिवादी के वकील ने कहा कि वादी यह तक नहीं बता पाया कि वह जमीन से कब और कैसे बेदखल हुआ।

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अदालत की अहम टिप्पणी

पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि स्थायी निषेधाज्ञा (perpetual injunction) मांगने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि मुकदमा दायर करते समय वादी जमीन के वास्तविक कब्जे में था।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा,

“कब्जा वापस पाने की मांग तभी टिक सकती है, जब याचिका में यह साफ लिखा हो कि कब्जा कब, कैसे और किस आधार पर छिना।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि बिना ठोस pleadings यानी स्पष्ट लिखित दावों के, केवल कुछ सबूतों के सहारे राहत नहीं दी जा सकती।

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अंतिम फैसला

सभी दलीलों और रिकॉर्ड को देखने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने माना कि वादी की याचिका में कब्जा खोने की तारीख, तरीका और आधार जैसी जरूरी बातें ही नहीं थीं।

इसी वजह से अदालत ने सिविल अपील खारिज कर दी और कहा कि पहले अपीलीय अदालत का नजरिया सही नहीं था।

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। लागत (costs) को लेकर कोई आदेश नहीं दिया गया।

Case Title: Kanta and Others vs Soma Devi (Dead) Through LRs

Case No.: Civil Appeal No. 8451 of 2011

Decision Date: 06 February 2026

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