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UGC के नए इक्विटी नियम सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर, छात्रों और नेताओं में बढ़ा विरोध

Vivek G.
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मृृत्युंजय तिवारी बनाम भारत संघ, यूजीसी के 2026 इक्विटी नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका, छात्रों और नेताओं ने भेदभाव और असमानता का आरोप लगाया।

UGC के नए इक्विटी नियम सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर, छात्रों और नेताओं में बढ़ा विरोध

विश्वविद्यालय परिसरों में समानता को लेकर बनाए गए यूजीसी के नए नियम अब कानूनी और राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गए हैं। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में 2026 के यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन को चुनौती देने वाली याचिका दाखिल की गई, वहीं देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्र संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने इन नियमों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामला सिर्फ नियमों का नहीं है, बल्कि इस बात का है कि क्या ये नियम सभी छात्रों के लिए समान सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं या किसी एक वर्ग को प्राथमिकता देते हैं।

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मामले की पृष्ठभूमि

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पोस्ट-डॉक्टोरल रिसर्चर मृृत्युंजय तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर यूजीसी के Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को चुनौती दी है।

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उनके वकील नीरज सिंह के अनुसार, इस याचिका को जल्द सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। याचिका में कहा गया है कि 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित नए नियम कई संवैधानिक सवाल खड़े करते हैं।

UGC ने ये नियम 2012 की व्यवस्था को बदलते हुए लागू किए थे, जिनका मकसद उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव रोकना और शिकायतों का तेजी से निपटारा करना बताया गया था।

याचिका में क्या आपत्ति है

याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह है कि नए नियम “जाति आधारित भेदभाव” को एकतरफा तरीके से परिभाषित करते हैं।

याचिका में कहा गया है कि नियम केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों को संरक्षण देते हैं, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों को इस दायरे से बाहर कर दिया गया है।

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याचिका के अनुसार,

“यह मान लिया गया है कि भेदभाव केवल एक ही दिशा में हो सकता है, जो कि संविधान के समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।”

इसके अलावा, 2025 के मसौदे में झूठी शिकायतों पर कार्रवाई का जो प्रावधान था, उसे अंतिम नियमों से हटा दिया गया है। इसी बात को लेकर भी आपत्ति जताई गई है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज

इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो गई है।

राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने सवाल उठाते हुए कहा,“अगर कानून सबके लिए समान है तो फिर इसमें सबको बराबर सुरक्षा क्यों नहीं दी गई? झूठे आरोपों की स्थिति में क्या होगा?”

वहीं, उत्तर प्रदेश के बीजेपी एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह ने यूजीसी को पत्र लिखकर कहा कि नियमों से सामान्य वर्ग के छात्रों में असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है। उन्होंने लिखा कि समानता जरूरी है, लेकिन इससे सामाजिक संतुलन नहीं बिगड़ना चाहिए।

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छात्र संगठनों की चिंता

उत्तराखंड के कुमाऊं विश्वविद्यालय के छात्र संघ ने भी यूजीसी को पत्र भेजकर इन नियमों का विरोध किया है। छात्रों का कहना है कि ये नियम “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत” के खिलाफ हैं।

छात्र संघ के अनुसार, “इन प्रावधानों से कैंपस में डर और अविश्वास का माहौल बन सकता है और नियमों का दुरुपयोग भी संभव है।”

UGC का पक्ष और आंकड़े

UGC ने इन नियमों को सही ठहराते हुए कहा है कि बीते पांच वर्षों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

आंकड़ों के अनुसार:

• 2019–20 में 173 मामले दर्ज हुए

• 2023–24 में यह संख्या बढ़कर 378 हो गई

इसी के चलते आयोग ने सख्त कदम उठाए हैं।

नए नियमों के तहत:

• हर संस्थान में इक्विटी कमेटी बनाना अनिवार्य होगा

• 24×7 हेल्पलाइन और ऑनलाइन शिकायत पोर्टल होगा

• 24 घंटे में शिकायत पर कार्रवाई शुरू करनी होगी

• 15 कार्यदिवस में जांच पूरी करनी होगी

• कुलपति और प्राचार्य व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे

समर्थन और असहमति दोनों

दिलचस्प बात यह है कि कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी नियमों को अधूरा बताया है। आईआरएस अधिकारी नेत्रपाल ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ये नियम एससी-एसटी छात्रों को होने वाले वास्तविक भेदभाव-जैसे दाखिले और इंटरव्यू में भेदभाव-को ठीक से संबोधित नहीं करते।

वहीं, बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कहा कि नियमों को लेकर फैलाई जा रही गलतफहमियां जल्द दूर होंगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि सामान्य वर्ग के हितों से कोई समझौता नहीं होगा।

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विवाद के बीच बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट आलोक अग्निहोत्री ने सोमवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपने फैसले की वजह यूजीसी के नए नियमों को बताया। इसके अलावा लखनऊ में भाजपा के कुछ कार्यकर्ताओं ने भी इस्तीफा सौंपा है।

अदालत का अगला कदम

अब इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट की नजर है। याचिका पर सुनवाई के बाद ही तय होगा कि यूजीसी के 2026 नियम मौजूदा रूप में लागू रहेंगे या इनमें बदलाव होगा।

फिलहाल, यह बहस देशभर के विश्वविद्यालयों में समानता, सुरक्षा और न्याय की परिभाषा पर नई बहस छेड़ चुकी है।

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