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उत्तराखंड हाईकोर्ट का फैसला: दूसरे जिले के आरोपी को समन से पहले जांच जरूरी, NI एक्ट केस में समन आदेश रद्द

Vivek G.
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भीम सिंह बनाम भवान दत्त भट्ट, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामले में कहा कि दूसरे जिले के आरोपी को समन से पहले CrPC धारा 202 के तहत जांच जरूरी, समन आदेश रद्द।

उत्तराखंड हाईकोर्ट का फैसला: दूसरे जिले के आरोपी को समन से पहले जांच जरूरी, NI एक्ट केस में समन आदेश रद्द

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि आरोपी अदालत के क्षेत्राधिकार से बाहर का निवासी है, तो समन जारी करने से पहले मजिस्ट्रेट को अनिवार्य रूप से प्रारंभिक जांच या जांच का आदेश देना होगा। अदालत ने पाया कि इस कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना समन जारी किया गया था, इसलिए समन आदेश और उससे जुड़ी पूरी कार्यवाही रद्द कर दी गई।

यह फैसला न्यायमूर्ति अशिष नैथानी की एकल पीठ ने दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला एक चेक बाउंस शिकायत से जुड़ा था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उसने आरोपी को घर निर्माण के लिए 20 लाख रुपये नकद दिए थे। बाद में निर्माण कार्य न होने पर आरोपी ने कथित रूप से 10-10 लाख रुपये के दो चेक जारी किए।

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जब ये चेक बैंक में लगाए गए तो पर्याप्त धनराशि न होने के कारण बाउंस हो गए। इसके बाद वैधानिक नोटिस भेजा गया, लेकिन भुगतान न मिलने पर शिकायतकर्ता ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत मामला दर्ज कराया।

इसके आधार पर अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, खटीमा (जिला उधम सिंह नगर) ने 29 जुलाई 2022 को आरोपी को समन जारी कर दिया।

आरोपी की दलील

आरोपी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर समन आदेश को चुनौती दी।

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि वह नैनीताल जिले का निवासी है, जबकि शिकायत खटीमा, उधम सिंह नगर की अदालत में दायर की गई थी। ऐसे में सीआरपीसी की धारा 202 के तहत मजिस्ट्रेट को पहले जांच करानी चाहिए थी।

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वकील ने अदालत को बताया कि समन आदेश में कहीं भी यह नहीं दिखता कि मजिस्ट्रेट ने ऐसी कोई जांच कराई या खुद की।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि समन आदेश यांत्रिक तरीके से पारित किया गया और इसमें न्यायिक विचार का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।

शिकायतकर्ता का पक्ष

दूसरी ओर, शिकायतकर्ता के वकील ने याचिका का विरोध किया।

उनका कहना था कि शिकायत में धारा 138 के सभी आवश्यक तत्व मौजूद हैं-चेक जारी होना, चेक का बाउंस होना, वैधानिक नोटिस भेजना और भुगतान न होना।

वकील ने तर्क दिया कि समन जारी करने के चरण पर मजिस्ट्रेट को केवल यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं।

उन्होंने यह भी कहा कि चेक के दुरुपयोग या सिविल विवाद से जुड़े तर्क ट्रायल के दौरान ही तय किए जा सकते हैं, न कि धारा 482 के तहत हाईकोर्ट में।

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अदालत की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में मुख्य प्रश्न आरोपों की सच्चाई नहीं, बल्कि समन आदेश की वैधानिकता है।

पीठ ने कहा कि जब आरोपी अदालत के क्षेत्राधिकार से बाहर रहता है, तब सीआरपीसी की धारा 202 के तहत मजिस्ट्रेट के लिए समन जारी करने से पहले जांच करना अनिवार्य है।

अदालत ने कहा:

“यह प्रावधान केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि अदालत के क्षेत्राधिकार से बाहर रहने वाले व्यक्ति को बिना जांच के समन किए जाने से बचाने के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी सुरक्षा है।”

पीठ ने पाया कि समन आदेश में धारा 202 के पालन का कोई उल्लेख नहीं है और न ही रिकॉर्ड में ऐसी किसी जांच का संकेत मिलता है।

अदालत ने कहा कि इस तरह की चूक मामले की जड़ से जुड़ी कानूनी त्रुटि है, जिसके कारण समन आदेश टिक नहीं सकता।

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अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने कहा कि जब समन जारी करने से पहले आवश्यक कानूनी प्रक्रिया का पालन ही नहीं किया गया, तो ऐसी स्थिति में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

अंततः अदालत ने 29 जुलाई 2022 के समन आदेश को रद्द कर दिया और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही भी समाप्त कर दी।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता को कानून के अनुसार फिर से उचित प्रक्रिया अपनाते हुए मामला आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता रहेगी।

Case Title: Bhim Singh vs. Bhawan Dutt Bhatt

Case No.: Criminal Misc. Application No. 1721 of 2022

Case Type: Petition under Section 482 CrPC

Decision Date: 27 February 2026

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