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वकील की चूक के लिए पार्टी को नुकसान नहीं उठाना चाहिए: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एकतरफा दूसरी अपील बहाल की, पुनर्विचार का आदेश दिया

Shivam
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दयाराम उर्फ ​​दयाला (मृतक) कानूनी वारिसों अंतर सिंह और अन्य के माध्यम से बनाम श्रीमती राजू बाई और अन्य - मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा कि वकीलों की अनुपस्थिति के कारण वादियों को नुकसान नहीं उठाना चाहिए, एकतरफा दूसरी अपील को बहाल किया और खर्च सहित पुनर्विचार का आदेश दिया।

वकील की चूक के लिए पार्टी को नुकसान नहीं उठाना चाहिए: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एकतरफा दूसरी अपील बहाल की, पुनर्विचार का आदेश दिया

इंदौर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम सिविल मामले में साफ कहा कि अगर कोई पक्षकार अपना वकील नियुक्त कर चुका है, तो उसे अदालत की हर तारीख पर निगरानी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने वकील की लगातार अनुपस्थिति के कारण एकतरफा हुए फैसले को दोबारा सुनने योग्य मानते हुए अपील बहाल करने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला मिस्‍क. सिविल केस नंबर 2808/2025 से जुड़ा है, जिसमें दयाराम उर्फ दयला (अब दिवंगत) के कानूनी उत्तराधिकारियों ने एक पुरानी दूसरी अपील को दोबारा सुनने की मांग की थी।

दरअसल, यह विवाद जमीन के स्वामित्व और बंटवारे से जुड़ा है, जिसकी शुरुआत वर्ष 1998 में दायर एक सिविल सूट से हुई थी। ट्रायल कोर्ट के फैसले के बाद पहला अपील और फिर दूसरी अपील हाईकोर्ट में दाखिल हुई।

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दूसरी अपील में नोटिस तामील होने के बावजूद, 2016 के बाद से प्रतिवादियों की ओर से कोई भी वकील अदालत में पेश नहीं हुआ। अंततः 15 अप्रैल 2025 को हाईकोर्ट ने उनकी अनुपस्थिति में एकतरफा फैसला सुना दिया।

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देरी और पक्षकारों की दलील

एकतरफा फैसले की जानकारी मिलने के बाद कानूनी उत्तराधिकारियों ने ऑर्डर 41 रूल 21 सीपीसी के तहत अपील की पुनःसुनवाई के लिए आवेदन दायर किया। इसमें 86 दिन की देरी हुई थी, जिसे माफ करने की भी मांग की गई।

आवेदकों का कहना था कि उन्होंने वकील नियुक्त किया था, लेकिन न तो वकील ने सुनवाई की तारीखों की जानकारी दी और न ही यह बताया कि वह अदालत में पेश नहीं हो रहे हैं।

“हमें भरोसा था कि हमारा पक्ष रखा जा रहा है,” उनके वकील ने अदालत में दलील दी।

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अदालत की टिप्पणियाँ

रिकॉर्ड देखने के बाद कोर्ट ने पाया कि लंबे समय तक वकील की अनुपस्थिति के बावजूद प्रतिवादियों को स्पेशल प्रोसेस नोटिस (SPC) भी जारी नहीं किया गया।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा,

“एक साधारण नागरिक से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अपने वकील की हर तारीख पर निगरानी रखे। अगर वकील चूक करता है, तो उसकी सजा मुवक्किल को नहीं मिलनी चाहिए।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एकतरफा आदेश की बाद की जानकारी होना यह साबित नहीं करता कि पक्षकारों को अंतिम सुनवाई की तारीख का ज्ञान था।

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कोर्ट का फैसला

सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने 86 दिन की देरी को माफ करते हुए पुनःसुनवाई का आवेदन स्वीकार कर लिया। अदालत ने निर्देश दिया कि संबंधित दूसरी अपील को फिर से सूचीबद्ध कर सुना जाए।

हालांकि, न्यायालय ने संतुलन बनाते हुए आवेदकों पर ₹10,000 की लागत भी लगाई, जो उन्हें छह सप्ताह के भीतर प्रतिवादी पक्ष को अदा करनी होगी।

Case Title: Dayaram @ Dayla (Deceased) Through LRs Anter Singh & Others vs. Smt. Raju Bai & Others

Case Number: Misc. Civil Case No. 2808 of 2025

Pronounced Date: 15 January 2026

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