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लिखित परीक्षा के बाद नियम बदले? सुप्रीम कोर्ट ने बिहार इंजीनियर भर्ती में रेट्रोस्पेक्टिव संशोधन पर लगाई रोक

Vivek G.
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अभय कुमार पटेल और अन्य बनाम बिहार राज्य और अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार इंजीनियर भर्ती में नियम बदलने पर रोक लगाई, कहा-चयन प्रक्रिया शुरू होने के बाद रेट्रोस्पेक्टिव संशोधन असंवैधानिक।

लिखित परीक्षा के बाद नियम बदले? सुप्रीम कोर्ट ने बिहार इंजीनियर भर्ती में रेट्रोस्पेक्टिव संशोधन पर लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट की भरी अदालत में मंगलवार को बिहार सरकार की इंजीनियर भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा एक अहम सवाल केंद्र में रहा-क्या चयन प्रक्रिया शुरू होने और मेरिट लिस्ट जारी होने के बाद नियम बदले जा सकते हैं? लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने साफ कहा कि “खेल शुरू होने के बाद उसके नियम नहीं बदले जा सकते।” इसी सिद्धांत के साथ कोर्ट ने 2022 के संशोधन नियमों को 2019 की चल रही भर्ती पर लागू करने से इनकार कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद बिहार इंजीनियरिंग सेवा क्लास–II भर्ती नियम, 2019 से जुड़ा है। इन नियमों के तहत सहायक अभियंता (सिविल, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल) पदों के लिए चयन केवल लिखित परीक्षा के अंकों के आधार पर होना था।

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बीपीएससी ने 2019 में विज्ञापन जारी किए, मार्च 2022 में परीक्षा हुई और जून–जुलाई 2022 में प्रोविजनल मेरिट लिस्ट भी प्रकाशित कर दी गई। उम्मीदवारों का दस्तावेज़ सत्यापन भी पूरा हो चुका था।

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इसी बीच नवंबर 2022 में राज्य सरकार ने नियमों में संशोधन कर अनुबंध पर कार्य कर चुके अभियंताओं को अनुभव के आधार पर अतिरिक्त अंक और आयु में छूट देने का प्रावधान जोड़ दिया, और इसे 2019 से प्रभावी बताया गया।

याचिकाकर्ताओं की दलील

अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि जब भर्ती प्रक्रिया शुरू हुई थी, तब ऐसे किसी वेटेज या आयु छूट का उल्लेख नहीं था। उम्मीदवारों ने उन्हीं शर्तों पर परीक्षा दी और मेरिट में स्थान पाया।

उनका कहना था कि बाद में नियम बदलकर चयन का आधार बदलना न केवल अनुचित है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में निहित समानता के अधिकार का भी उल्लंघन है।

एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील के दौरान कहा, “लिखित परीक्षा और मेरिट लिस्ट के बाद नए अंक जोड़ना पूरे चयन ढांचे को ही पलट देता है।”

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राज्य सरकार ने इसे एक नीतिगत निर्णय बताया। सरकार का कहना था कि अनुबंध पर वर्षों से काम कर रहे अभियंताओं के अनुभव को मान्यता देना आवश्यक था।

सरकार ने यह भी तर्क दिया कि प्रोविजनल मेरिट लिस्ट से किसी को नियुक्ति का पक्का अधिकार नहीं मिलता और संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत नियमों में पिछली तारीख से संशोधन किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां

न्यायमूर्ति जे. के. महेश्वरी और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि चयन प्रक्रिया विज्ञापन जारी होने के साथ शुरू हो जाती है और उसके बाद पात्रता या मेरिट के मानदंड बदलना मनमाना होगा।

पीठ ने कहा, “लिखित परीक्षा हो चुकी है, परिणाम आ चुके हैं और दस्तावेज़ सत्यापन भी पूरा है। ऐसे में चयन का आधार बदलना नियमों के साथ अन्याय है।”

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि कार्यकारी आदेश या नीतिगत निर्णय, उस समय लागू वैधानिक भर्ती नियमों पर हावी नहीं हो सकते।

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अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें संशोधित नियमों को लागू करने की अनुमति दी गई थी।

अदालत ने निर्देश दिया कि 2019 के विज्ञापनों के तहत चल रही भर्ती प्रक्रिया को केवल पुराने, बिना संशोधन वाले 2019 नियमों के अनुसार ही पूरा किया जाए। जून–जुलाई 2022 में जारी मेरिट लिस्ट के आधार पर नियुक्तियां दो महीने के भीतर पूरी करने का आदेश दिया गया।

Case Title: Abhay Kumar Patel & Ors. vs State of Bihar & Ors.

Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 22323 of 2023

Case Type: Service Law / Recruitment Rules

Decision Date: 06 January 2026

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