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समय सीमा बढ़ाने का अधिकार किस कोर्ट को? सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया - सिविल कोर्ट ही सक्षम प्राधिकरण

Vivek G.
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जगदीप चौगुले बनाम शीला चौगुले और अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मध्यस्थता में समय बढ़ाने की अर्जी सिविल कोर्ट में ही दी जाएगी, भले ही मध्यस्थ हाईकोर्ट ने नियुक्त किया हो।

समय सीमा बढ़ाने का अधिकार किस कोर्ट को? सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया - सिविल कोर्ट ही सक्षम प्राधिकरण

देश की सर्वोच्च अदालत ने मध्यस्थता (Arbitration) कानून से जुड़े एक अहम सवाल पर स्पष्ट फैसला दिया है। सवाल था - अगर हाईकोर्ट ने मध्यस्थ नियुक्त किया हो और तय समय में फैसला न आ पाए, तो क्या समय बढ़ाने का अधिकार हाईकोर्ट को होगा या सिविल कोर्ट को?

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि समय बढ़ाने की अर्जी केवल सिविल कोर्ट में ही दी जाएगी, चाहे मध्यस्थ की नियुक्ति हाईकोर्ट ने ही क्यों न की हो।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद गोवा से जुड़े एक पारिवारिक समझौते से शुरू हुआ।

चौगुले परिवार के सदस्यों के बीच 2021 में एक पारिवारिक समझौता हुआ था, जिसमें मध्यस्थता की शर्त थी। बाद में विवाद बढ़ा और मध्यस्थ की नियुक्ति हाईकोर्ट द्वारा की गई।

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लेकिन तय समय में मध्यस्थ फैसला नहीं दे सके। इसके बाद पक्षकारों ने Arbitration Act की धारा 29A के तहत समय बढ़ाने की अर्जी कमर्शियल कोर्ट में दी।

यहीं से विवाद शुरू हुआ।

दूसरे पक्ष ने कहा -

“जब मध्यस्थ हाईकोर्ट ने नियुक्त किया है, तो समय बढ़ाने का अधिकार भी सिर्फ हाईकोर्ट को होना चाहिए।”

इसी सवाल पर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

कोर्ट के सामने मुख्य सवाल

सुप्रीम कोर्ट के सामने असल सवाल यह था -

• क्या धारा 29A के तहत समय बढ़ाने की अर्जी हाईकोर्ट में जाएगी, या सिविल कोर्ट (Principal Civil Court) में?

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हाईकोर्टों में पहले से मतभेद

इस मुद्दे पर देशभर की हाईकोर्टों में अलग-अलग राय थी।

कुछ हाईकोर्टों का मानना था, कि जब नियुक्ति हाईकोर्ट ने की है, तो वही समय भी बढ़ाएगा।

कुछ अन्य हाईकोर्टों ने कहा, कि Arbitration Act की परिभाषा के अनुसार, “Court” का मतलब जिला स्तर की सिविल कोर्ट होता है।

इसी भ्रम को दूर करने के लिए यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट रुख

जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिंह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा:

“केवल इस आधार पर कि मध्यस्थ की नियुक्ति हाईकोर्ट ने की थी, यह नहीं माना जा सकता कि समय बढ़ाने का अधिकार भी हाईकोर्ट को ही होगा।”

कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा-

• धारा 29A में ‘Court’ का अर्थ वही है जो धारा 2(1)(e) में दिया गया है।

• यानी Principal Civil Court of Original Jurisdiction।

• हाईकोर्ट तभी “Court” होगा जब उसके पास ओरिजिनल सिविल जूरिस्डिक्शन हो।

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कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“हाईकोर्ट की भूमिका केवल मध्यस्थ की नियुक्ति तक सीमित है। एक बार नियुक्ति हो जाने के बाद, हाईकोर्ट का कोई पर्यवेक्षणीय अधिकार नहीं बचता।”

एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी में कोर्ट ने कहा:

“कानून की व्याख्या ‘हाइरार्की’ या ‘ऊंचे-नीचे कोर्ट’ के आधार पर नहीं की जा सकती। अधिकार वही होगा जो कानून देता है।”

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि-

• धारा 11 (मध्यस्थ की नियुक्ति)

• और धारा 29A (समय विस्तार)

दोनों अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं और एक-दूसरे से जुड़ी नहीं हैं।

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अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने:

• बॉम्बे हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच का फैसला रद्द कर दिया

• सिंगल जज का आदेश भी रद्द किया

• कमर्शियल कोर्ट द्वारा दिया गया समय-विस्तार बहाल किया

• साफ किया कि आगे की अर्जी भी सिविल कोर्ट में ही दी जाएगी

कोर्ट ने कहा कि पक्षकार चाहें तो अब फिर से धारा 29A के तहत आवेदन दे सकते हैं।

Case Title: Jagdeep Chowgule v. Sheela Chowgule & Ors.

Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 10944–10945 of 2025

Decision Date: 29 January 2026

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