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सबूतों की कड़ी टूटी, सुप्रीम कोर्ट ने हत्या मामले में दो आरोपियों को किया बरी

Vivek G.
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बर्नार्ड लिंगदोह फावा बनाम मेघालय राज्य, सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय हत्या मामले में सबूतों की कमी और कमजोर जांच के आधार पर हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए दोनों आरोपियों को बरी किया।

सबूतों की कड़ी टूटी, सुप्रीम कोर्ट ने हत्या मामले में दो आरोपियों को किया बरी

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय के बहुचर्चित हत्या मामले में अहम फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट द्वारा दी गई सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपराध की “अटूट कड़ी” साबित करने में पूरी तरह असफल रहा और केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

यह मामला एक युवक की गुमशुदगी से शुरू हुआ था, जिसकी बाद में लाश एक कब्र से बरामद हुई थी। पुलिस जांच के बाद दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और ट्रायल कोर्ट में मामला चला। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों की कमजोरी को देखते हुए दोनों को बरी कर दिया था। बाद में हाईकोर्ट ने उस फैसले को पलटते हुए दोषसिद्धि कर दी, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है।

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मामले की पृष्ठभूमि

मृतक कॉलेज का छात्र था और 18 फरवरी 2006 को लापता हुआ था। बाद में उसका शव एक कब्र से बरामद हुआ। पुलिस का दावा था कि आरोपियों ने उसकी हत्या कर शव को दफना दिया।

जांच के दौरान पुलिस ने:

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• “लास्ट सीन थ्योरी”

• कथित फिरौती कॉल

• रस्सी की बरामदगी

• और आरोपियों के कथित कबूलनामे

को सबूत के रूप में पेश किया।

सबूतों पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था, लेकिन वे आपस में जुड़ नहीं पाए।

लास्ट सीन थ्योरी पर सवाल

कोर्ट ने कहा कि यह साबित नहीं हो सका कि मृतक को आखिरी बार आरोपियों के साथ ही देखा गया था। गवाहों के बयान अस्पष्ट थे और समय का भी कोई पुख्ता निर्धारण नहीं था।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी निर्णायक नहीं

डॉक्टर की रिपोर्ट में यह साफ नहीं था कि मौत गला घोंटने से हुई या फांसी से। कोर्ट ने कहा कि मेडिकल साक्ष्य हत्या की पुष्टि नहीं करता।

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बरामदगी पर संदेह

जिस रस्सी को हत्या का हथियार बताया गया, उस पर न खून मिला, न डीएनए।

बरामद सामानों को मृतक से जोड़ने का कोई ठोस प्रमाण नहीं था।

कबूलनामा भी भरोसेमंद नहीं

अदालत ने कहा कि:

• कबूलनामा स्वेच्छा से दिया गया, यह साबित नहीं हुआ

• मजिस्ट्रेट ने आरोपी को कानूनी सहायता का अधिकार नहीं बताया

• बयान में तारीखों और हस्ताक्षरों में गंभीर विरोधाभास थे

• एक आरोपी का बयान दूसरे को फंसाने वाला था, खुद को नहीं

कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसे बयान के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।

हाईकोर्ट का फैसला क्यों पलटा गया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते समय यह नहीं देखा कि:

• क्या अभियोजन ने अपराध की पूरी श्रृंखला साबित की?

• क्या कोई वैकल्पिक संभावना बचती है?

• क्या सबूत संदेह से परे हैं?

इन सभी सवालों का जवाब “नहीं” था।

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सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश

अदालत ने कहा:

“इस मामले में कोई भी ठोस परिस्थिति ऐसी नहीं है जो आरोपियों को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त हो।”

इसके साथ ही:

• हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया गया

• ट्रायल कोर्ट का बरी करने वाला आदेश बहाल किया गया

• यदि आरोपी जेल में हैं तो तत्काल रिहाई के आदेश दिए गए

• जमानत पर हों तो बॉन्ड समाप्त माने जाएंगे

निष्कर्ष

यह फैसला एक बार फिर याद दिलाता है कि

सिर्फ शक या अधूरी कड़ी के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
आपराधिक कानून में सबूतों की मजबूती सबसे अहम होती है, और संदेह का लाभ हमेशा आरोपी को जाता है।

Case Title: Bernard Lyngdoh Phawa vs State of Meghalaya

Case No.: Criminal Appeal No. 3738 of 2023

Decision Date: 27 January 2026

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