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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फोटो-पहचान शुल्क 125 रुपये तक सीमित किया, मुवक्किलों से अधिक शुल्क वसूलने पर रोक

Shivam Y.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि मुवक्किलों से फोटो-एफिडेविट पहचान के लिए 125 रुपये से अधिक शुल्क नहीं लिया जा सकता। बार एसोसिएशन को 15 दिनों में नए रसीदें जारी करने का निर्देश दिया गया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फोटो-पहचान शुल्क 125 रुपये तक सीमित किया, मुवक्किलों से अधिक शुल्क वसूलने पर रोक

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुवक्किलों से फोटो-एफिडेविट पहचान के लिए 22 नवंबर 2024 के कार्यालय ज्ञापन में निर्धारित 125 रुपये से अधिक शुल्क नहीं लिया जा सकता। न्यायमूर्ति अत्ताउर रहमान मसूदी और न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह की पीठ ने इलाहाबाद और लखनऊ में बार एसोसिएशन द्वारा जारी रसीदों में अंतर को दूर करते हुए यह निर्देश दिया।

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कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन और अवध बार एसोसिएशन (लखनऊ) को 15 दिनों के भीतर अपनी रसीदों को संशोधित करने का आदेश दिया, ताकि 125 रुपये का शुल्क स्पष्ट रूप से उल्लिखित हो। पीठ ने कहा:

"दोनों बार एसोसिएशन को परिपत्र के अनुरूप रसीदें जारी करनी होंगी। कार्यवाही दायर करने के लिए मुवक्किलों से निर्धारित शुल्क से अधिक नहीं लिया जाएगा।"

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पृष्ठभूमि

यह मामला मई 2025 के एकल न्यायाधीश के आदेश के बाद उठा, जिसमें फोटो पहचान के दौरान "अधिवक्ता कल्याण कोष" के नाम पर लिए जाने वाले अतिरिक्त 500 रुपये के शुल्क को खारिज कर दिया गया था। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, जो मूल रूप से मामले का पक्षकार नहीं था, ने अपील की और तर्क दिया कि उसे सुना नहीं गया। पीठ ने अपील की अनुमति दी, लेकिन 125 रुपये की सीमा को बरकरार रखते हुए जोर दिया कि कल्याणकारी योजनाएँ स्वैच्छिक ही रहनी चाहिए।

रसीदों में अंतर:

  • इलाहाबाद की रसीदों में 125 रुपये के फोटो शुल्क को 475 रुपये के स्वैच्छिक कल्याण योगदान के साथ एक ही रसीद नंबर के तहत जोड़ा गया था।
  • लखनऊ की रसीदों में 125 रुपये का शुल्क बिल्कुल नहीं दिखाया गया था, केवल रसीद नंबर ही दिए गए थे।

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कोर्ट ने ऐसी प्रथाओं पर रोक लगाते हुए कहा:

"अनिवार्य एफिडेविट आवश्यकताओं के साथ कल्याण योजना शुल्क को जोड़ा नहीं जा सकता।"

नोटरी पब्लिक एफिडेविट में त्रुटियों की जाँच

पीठ ने एकल न्यायाधीश के उस आदेश को संशोधित किया, जिसमें नोटरी पब्लिक द्वारा प्रमाणित एफिडेविट में त्रुटियों को चिह्नित करने से रजिस्ट्री को रोका गया था। हाईकोर्ट नियमों के अध्याय II, नियम 1(ii) का हवाला देते हुए पीठ ने कहा:

"रजिस्ट्री को नियमों के अनुसार त्रुटियों को चिह्नित करना होगा, ताकि वकील उन्हें सुधार सकें।"

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