Logo

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निलंबन आदेश रद्द किए, कहा-बिना ठोस आधार के कार्रवाई स्वीकार्य नहीं

Rajan Prajapati
Add Court Book as a preferred source on Google

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ICC सदस्यों के निलंबन को रद्द करते हुए कहा कि आदेश बिना ठोस आधार और पर्याप्त विचार के पारित किए गए थे। - प्रतिभा एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य; कुमारी सुनीता देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निलंबन आदेश रद्द किए, कहा-बिना ठोस आधार के कार्रवाई स्वीकार्य नहीं

लखनऊ बेंच में सुनवाई के दौरान एक अहम फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आंतरिक शिकायत समिति (ICC) के सदस्यों के खिलाफ जारी निलंबन आदेशों को रद्द कर दिया। अदालत ने पाया कि आदेश जल्दबाजी में और बिना पर्याप्त विचार के पारित किए गए थे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला Km. सुनीता देवी बनाम राज्य उत्तर प्रदेश और उससे जुड़े अन्य याचिकाओं से संबंधित है। याचिकाकर्ता उन अधिकारियों में शामिल थे, जो कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से जुड़े एक मामले की जांच के लिए गठित आंतरिक शिकायत समिति के सदस्य थे।

जुलाई 2025 में एक शिकायत मिलने के बाद समिति का गठन किया गया और उसी दिन रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया। समिति ने जांच के बाद आरोपी अधिकारी को दोषमुक्त करार दिया। इसके तुरंत बाद पहले आरोपी अधिकारी और फिर समिति के सदस्यों को निलंबित कर दिया गया।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में चुनौती देते हुए कहा कि उनकी भूमिका केवल जांच रिपोर्ट देना था, जो सिफारिशात्मक (recommendatory) होती है, अंतिम निर्णय नहीं।

Court Book subscription: bare acts, legal drafts, court judgments and ad-free legal news, plans from ₹30/month

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति मनीष माथुर ने राज्य की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि निलंबन आदेशों में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि समिति के सदस्यों के आचरण में कोई गंभीर त्रुटि थी या नहीं।

अदालत ने टिप्पणी की,

“आदेशों में यह नहीं दर्शाया गया कि निलंबन का आधार निर्णय की वैधता है या सदस्यों का आचरण। यह पूरी तरह सतही प्रतीत होता है।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि समिति को एक ही दिन में रिपोर्ट देने का निर्देश देना, 2013 के कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत था।

Read also:- बैंक की मनमानी पर हाईकोर्ट सख्त: compassionate appointment ठुकराना अवैध, आदेश रद्द

अदालत ने स्पष्ट किया कि आंतरिक शिकायत समिति एक प्रकार की अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) संस्था की तरह कार्य करती है। ऐसे में केवल उसकी रिपोर्ट के आधार पर उसके सदस्यों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करना न्यायसंगत नहीं है।

कोर्ट ने कहा,

“बिना किसी प्रारंभिक संतोष (prima facie satisfaction) के इस तरह का निलंबन आदेश पारित करना कानून के अनुरूप नहीं है।”

सभी तथ्यों और तर्कों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने 5 और 6 अगस्त 2025 के निलंबन आदेशों को रद्द कर दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि यदि आवश्यक हो तो प्राधिकरण नए सिरे से आदेश पारित कर सकता है, लेकिन वह केवल उचित कानूनी प्रक्रिया और कोर्ट की टिप्पणियों के अनुरूप ही होना चाहिए।

अंततः, याचिकाएं स्वीकार कर ली गईं और पक्षों को अपने-अपने खर्च वहन करने का निर्देश दिया गया।

Case Details:

Case Title: Pratibha & Others vs State of U.P. & Others; Km. Sunita Devi vs State of U.P. & Others

Case Number: Writ-A No. 9112 of 2025 & 9114 of 2025

Judge: Justice Manish Mathur

Decision Date: April 20, 2026

Download Order

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Get it on Google PlayDownload on the App Store
Join the Court Book WhatsApp channel for latest judgments, notifications, legal news and exam updates