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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जब्त वाहन मामला पलटा: आदेश रद्द, याचिकाकर्ता को मुआवज़ा देने का निर्देश

Rajan Prajapati
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गौ-तस्करी के आरोप में जब्त वाहन का आदेश रद्द कर याचिकाकर्ता को आर्थिक नुकसान और मानसिक पीड़ा के लिए मुआवज़ा देने का निर्देश दिया। - चंद्रभान कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जब्त वाहन मामला पलटा: आदेश रद्द, याचिकाकर्ता को मुआवज़ा देने का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कथित गौ-तस्करी से जुड़े वाहन जब्ती मामले में जिला प्रशासन के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने न सिर्फ वाहन जब्ती को अवैध ठहराया, बल्कि याचिकाकर्ता को आर्थिक नुकसान और मानसिक पीड़ा के लिए मुआवज़ा देने का भी निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एक वाहन संख्या UP65-JT-0125 से जुड़ा है, जिसे 8 सितंबर 2024 को चंदौली जिले में पुलिस ने रोककर जब्त किया था। पुलिस का आरोप था कि प्रशासन ने आरोप लगाया कि वाहन में गौवंशीय पशु ले जाए जा रहे थे, जबकि याचिकाकर्ता ने इस आरोप से इनकार किया।

इसके आधार पर पुलिस ने यूपी गोवध निवारण अधिनियम, 1955 और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत FIR दर्ज की। बाद में जिला मजिस्ट्रेट ने यह मानते हुए कि पशुओं को बिना परमिट के ले जाया जा रहा था, वाहन को जब्त करने का आदेश दिया।

याचिकाकर्ता ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए कहा कि वाहन को गलत तरीके से जब्त किया गया और उसमें कोई पशु नहीं थे।

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मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संदीप जैन ने रिकॉर्ड और दलीलों का गहन परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि प्रशासन ने केवल अनुमान के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि पशु वध के लिए ले जाए जा रहे थे।

कोर्ट ने कहा,

“सिर्फ इस आधार पर कि वाहन बिहार सीमा के पास पकड़ा गया, यह मान लेना कि पशु वध के लिए ले जाए जा रहे थे, पर्याप्त नहीं है।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि उचित साक्ष्य के बिना इतनी कठोर कार्रवाई करना कानून के अनुरूप नहीं है। कोर्ट के अनुसार, जब्ती आदेश में ठोस आधार और पर्याप्त प्रमाण का अभाव था।

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मुख्य सवाल यह था कि क्या बिना ठोस सबूत के, केवल संदेह के आधार पर वाहन की जब्ती वैध है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी दंडात्मक कार्रवाई के लिए ठोस साक्ष्य आवश्यक हैं, केवल अनुमान या परिस्थितिजन्य धारणा पर्याप्त नहीं होती।

कोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट (22 मार्च 2025) और आयुक्त वाराणसी (27 नवंबर 2025) के आदेशों को रद्द कर दिया।

साथ ही, अदालत ने निम्न निर्देश दिए:

• याचिकाकर्ता को 8 सितंबर 2024 से वाहन की वापसी तक ₹15,000 प्रति माह के हिसाब से आर्थिक नुकसान का मुआवज़ा दिया जाए।

• मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न के लिए ₹20,000 अतिरिक्त दिए जाएं।

• यदि वाहन वापस नहीं किया जाता है, तो ₹4 लाख (घटती कीमत के अनुसार) का भुगतान किया जाए।

• सभी भुगतान 15 दिनों के भीतर किए जाएं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार इन मुआवज़ों की वसूली संबंधित अधिकारियों से कर सकती है।

Case Details

Case Title: Chandrabhan Kumar vs State of U.P. & Others

Case Number: Criminal Misc. Writ Petition No. 28877 of 2025

Judge: Justice Sandeep Jain

Decision Date: April 30, 2026

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