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BNSS 2023 पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: जजों को अभियोजन प्रमुख बनाने का प्रावधान संविधान के खिलाफ?

Vivek G.
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सुबीश पी. एस. बनाम भारत संघ, सुप्रीम कोर्ट में BNSS 2023 की धारा 20 को चुनौती। जजों को अभियोजन प्रमुख बनाने का प्रावधान न्यायिक स्वतंत्रता पर सवाल।

BNSS 2023 पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: जजों को अभियोजन प्रमुख बनाने का प्रावधान संविधान के खिलाफ?

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को एक नई संवैधानिक बहस की दस्तक सुनाई दी। केरल के एक वकील ने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए उस कानूनी प्रावधान को चुनौती दी है, जो राज्य सरकारों को यह अनुमति देता है कि वे मौजूदा या सेवानिवृत्त जजों को अभियोजन निदेशालय का प्रमुख बना सकें। यह मामला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 यानी BNSS से जुड़ा है, जो हाल ही में आपराधिक कानून सुधारों के तहत लागू हुई है।

याचिका पर अभी सुनवाई शुरू नहीं हुई है, लेकिन दाखिल होते ही इसने न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच की संवैधानिक रेखा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका अधिवक्ता सुबीश पी. एस. ने दाखिल की है। उन्होंने BNSS की धारा 20(2)(a) और 20(2)(b) को चुनौती दी है। इन धाराओं के तहत सेशंस जज, मजिस्ट्रेट या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी राज्य के अभियोजन निदेशालय में निदेशक, उप निदेशक या सहायक निदेशक जैसे पदों पर नियुक्त किए जा सकते हैं।

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BNSS की धारा 20 के अनुसार हर राज्य में अभियोजन निदेशालय बनाया जा सकता है, जो सीधे राज्य के गृह विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करेगा। सभी लोक अभियोजक और सहायक लोक अभियोजक इसी निदेशालय के अधीन होंगे।

याचिकाकर्ता का कहना है कि यह व्यवस्था जजों को एक ऐसे ढांचे में ले जाती है, जो पूरी तरह कार्यपालिका के नियंत्रण में है।

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याचिकाकर्ता की दलील

याचिका में कहा गया है कि न्यायाधीशों से संविधान यह अपेक्षा करता है कि वे तटस्थ निर्णायक की भूमिका निभाएं। लेकिन जब वही जज अभियोजन व्यवस्था का हिस्सा बनते हैं, तो यह निष्पक्षता खतरे में पड़ जाती है।

याचिका में कहा गया,

“जब कोई न्यायिक अधिकारी गृह विभाग के अधीन अभियोजन व्यवस्था में काम करता है, तो न्यायिक स्वतंत्रता की वास्तविकता और उसकी धारणा, दोनों प्रभावित होती हैं।”

याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 50 और 235 का हवाला देते हुए कहा कि ये प्रावधान न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखने के लिए बनाए गए हैं। अनुच्छेद 50 न्यायपालिका और कार्यपालिका के पृथक्करण की बात करता है, जबकि अनुच्छेद 235 के तहत अधीनस्थ न्यायपालिका पर नियंत्रण केवल हाई कोर्ट के पास होता है।

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औपनिवेशिक व्यवस्था की वापसी?

याचिका में इतिहास का भी जिक्र किया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, ब्रिटिश काल के दंड प्रक्रिया संहिता, खासकर 1898 की संहिता में जांच, अभियोजन और न्यायिक कार्य एक-दूसरे में गड्ड-मड्ड थे। मजिस्ट्रेट जांच की निगरानी भी करते थे और फैसला भी सुनाते थे।

याचिका के मुताबिक, आज़ादी के बाद 1973 की दंड प्रक्रिया संहिता ने इस औपनिवेशिक मॉडल को तोड़ा और तीनों कार्यों को अलग किया।

याचिका में कहा गया,

“BNSS, 2023 ने उस व्यवस्था को फिर से जीवित कर दिया है, जिसे स्वतंत्र भारत ने जानबूझकर त्याग दिया था।”

अदालत में उठे संवैधानिक सवाल

याचिका में यह भी कहा गया है कि अभियोजन का काम सरकार का पक्ष रखना नहीं, बल्कि न्याय में अदालत की मदद करना होता है। जब पूरा अभियोजन तंत्र कार्यपालिका के अधीन हो और उसका नेतृत्व जज करें, तो निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्रभावित होता है।

इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (निष्पक्ष प्रक्रिया का अधिकार) के उल्लंघन की बात कही है। उनका तर्क है कि इन प्रावधानों में ऐसा कोई सुरक्षा तंत्र नहीं है, जो कार्यपालिका के प्रभाव को रोक सके।

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याचिका में क्या मांग की गई

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि BNSS की धारा 20(2)(a) और 20(2)(b) को उस हद तक रद्द किया जाए, जहां वे जजों को कार्यपालिका-नियंत्रित अभियोजन पदों पर नियुक्त करने की अनुमति देती हैं।

वैकल्पिक रूप से यह भी मांग की गई है कि अभियोजन विभागों का पुनर्गठन संविधान के अनुच्छेद 50 के अनुरूप किया जाए और न्यायिक अधिकारियों को कार्यपालिका के ढांचे से पूरी तरह अलग रखा जाए।

मामला फिलहाल Supreme Court of India में सूचीबद्ध है और अभी इस पर सुनवाई की तारीख तय नहीं हुई है।

Case Title: Subeesh P. S. v. Union of India

Case No.: Diary No. 7857/2026

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