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चेक बाउंस मामला: आरोपी को नोटिस रिश्तेदार को देने पर बरी किया गया - केरल हाईकोर्ट का निर्णय

Shivam Y.

केरल हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामले में आरोपी को बरी किया, कहा कि नोटिस अगर रिश्तेदार को दिया गया हो और आरोपी को इसकी जानकारी न हो, तो धारा 138 एनआई एक्ट के तहत वैध नहीं है।

चेक बाउंस मामला: आरोपी को नोटिस रिश्तेदार को देने पर बरी किया गया - केरल हाईकोर्ट का निर्णय

केरल हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत वैधानिक नोटिस अगर आरोपी के किसी रिश्तेदार को दिया जाता है, तो वह तब तक मान्य नहीं होगा जब तक यह सिद्ध न हो जाए कि आरोपी को उस नोटिस की जानकारी थी। यह महत्वपूर्ण फैसला साजू बनाम शालीमार हार्डवेयर्स एंड अन्य (Crl. Rev. Pet. No. 1015 of 2024) के मामले में न्यायमूर्ति पी.वी. कुन्हीकृष्णन की पीठ ने दिया।

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यह मामला ₹92,500 के एक चेक से जुड़ा था जो साजू ने मार्च 2019 में शालीमार हार्डवेयर्स से निर्माण सामग्री खरीदने पर जारी किया था। यह चेक अपर्याप्त धनराशि के कारण अनादृत हो गया। कानून के अनुसार, शिकायतकर्ता ने 27 अप्रैल 2019 को वैधानिक नोटिस भेजा। लेकिन यह नोटिस स्वयं साजू को नहीं, बल्कि उनके एक रिश्तेदार को प्राप्त हुआ।

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“आरोपी के रिश्तेदार को नोटिस देना पर्याप्त नहीं है, खासकर जब शिकायतकर्ता की ओर से यह कोई साक्ष्य न हो कि आरोपी को उस नोटिस की जानकारी थी,” न्यायमूर्ति पी.वी. कुन्हीकृष्णन ने कहा।

“यदि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, तो यह माना जाएगा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138(ब) के अंतर्गत वैधानिक नोटिस आरोपी को नहीं दिया गया।”

निचली अदालत ने साजू को दोषी ठहराते हुए तीन महीने की साधारण कारावास और सीआरपीसी की धारा 357(3) के तहत मुआवज़ा देने का आदेश दिया था। अपीलीय अदालत ने कारावास को घटाकर एक महीने कर दिया लेकिन दोषसिद्धि को बरकरार रखा। साजू ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल कर वैधानिक नोटिस की वैधता को चुनौती दी।

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याचिकाकर्ता के वकील मंजूषा के ने दलील दी कि धारा 138(ब) के तहत आवश्यक वैधानिक नोटिस सही तरीके से नहीं दिया गया। जिरह के दौरान यह सिद्ध हुआ कि शिकायतकर्ता के पास यह साबित करने का कोई प्रमाण नहीं है कि आरोपी को नोटिस की जानकारी थी।

“शिकायतकर्ता की ओर से ऐसा कोई मामला नहीं है कि आरोपी को नोटिस के बारे में जानकारी थी। अतः इसे वैकल्पिक (constructive) सेवा नहीं माना जा सकता,” कोर्ट ने कहा।

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कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय थॉमस एम.डी. बनाम पी.एस. जलील (2009) का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि आरोपी की पत्नी को नोटिस देना धारा 138(ब) का पालन नहीं माना जा सकता।

अंत में, केरल हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए साजू को बरी कर दिया। साथ ही, ट्रायल और अपील के दौरान उन्होंने जो भी राशि जमा की हो, उसे लौटाने का आदेश दिया।

केस का शीर्षक - साजू बनाम शालीमार हार्डवेयर्स एवं अन्य

केस संख्या - सीआरएल. रेव. पेट. 1015/2024

याचिकाकर्ता के वकील - मंजूषा के., एम. टी. सुरेशकुमार, श्रीलक्ष्मी बाबू

प्रतिवादी के वकील - ऋत्विक सी.एस. - लोक अभियोजक

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