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गुजरात उच्च न्यायालय ने रेल दुर्घटना मामले में गर्भवती महिला का मृत शिशु के लिए अलग से मुआवजा देने का आदेश दिया

Shivam Y.

गुजरात हाईकोर्ट ने रेलवे दुर्घटना में मृत जन्मे बच्चे को भी कानूनी रूप से “व्यक्ति” मानते हुए पिता को ₹8 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया। - जयप्रकाश घसीटेलाल बनाम भारत संघ, महाप्रबंधक

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गुजरात उच्च न्यायालय ने रेल दुर्घटना मामले में गर्भवती महिला का मृत शिशु के लिए अलग से मुआवजा देने का आदेश दिया
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गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि रेलवे दुर्घटना में मृत जन्मे (stillborn) बच्चे को भी कानून के तहत “व्यक्ति” माना जा सकता है और उसके माता-पिता मुआवजे के हकदार हैं। अदालत ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द करते हुए बच्चे के पिता को ₹8 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला जयप्रकाश घासितेलाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया से जुड़ा है। 15 अप्रैल 2018 को जयप्रकाश अपनी गर्भवती पत्नी उषा देवी के साथ ट्रेन से यात्रा कर रहे थे। उषा देवी नौ महीने की गर्भवती थीं। परिवार के अनुसार ट्रेन में भारी भीड़ थी और उषा देवी डिब्बे के दरवाजे के पास खड़ी थीं। तभी ट्रेन के झटके से वह चलती ट्रेन से गिर गईं। अस्पताल ले जाते समय उनकी मौत हो गई। उनके गर्भ में पल रहे बच्चे की भी जान चली गई।

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पति ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल में मृत जन्मे बच्चे के लिए ₹8 लाख मुआवजे की मांग की थी, लेकिन ट्रिब्यूनल ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि अजन्मा बच्चा को रेलवे कानून के तहत “बोना फाइड पैसेंजर” नहीं माना जा सकता।

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जे. सी. दोशी ने कहा कि भारतीय न्याय व्यवस्था समय के साथ विकसित हुई है और अब अजन्मा बच्चा के अधिकारों को भी मान्यता दी जा रही है। अदालत ने कई भारतीय और विदेशी फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि गर्भ में पल रहा बच्चा, विशेषकर पांच महीने से अधिक की गर्भावस्था में, एक स्वतंत्र जीवन माना जा सकता है।

कोर्ट ने कहा,

“फीटस को बच्चे के रूप में माना जाता है और उसकी मृत्यु को स्वतंत्र दुर्घटना माना जाएगा। मृत जन्मा बच्चा भी सभी उद्देश्यों के लिए एक व्यक्ति है और रेलवे कानून के तहत मुआवजे का हकदार है।”

अदालत ने यह भी कहा कि नौ महीने का गर्भस्थ शिशु “existence में child” माना जाएगा और ऐसे मामले में कानून की उदार व्याख्या की जानी चाहिए।

रेलवे प्रशासन ने अदालत में दलील दी थी कि कानून में “मृत बच्चा” का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। साथ ही, गर्भ में पल रहा बच्चा अलग यात्री नहीं माना जा सकता, इसलिए मुआवजा नहीं दिया जा सकता।

हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

हाईकोर्ट ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द कर दिया और कहा कि मृत जन्मे बच्चे की मौत भी रेलवे दुर्घटना का परिणाम थी। अदालत ने रेलवे प्रशासन को निर्देश दिया कि वह 12 सप्ताह के भीतर ₹8 लाख मुआवजा 9% वार्षिक ब्याज सहित जमा करे।

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Case Details

Case Title: Jayprakash Ghasitelal vs Union of India Through General Manager

Case Number: R/First Appeal No. 159 of 2022

Judge: Justice J. C. Doshi

Decision Date: May 7, 2026

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