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IBC के तहत व्यक्तिगत दिवालियापन का हवाला देकर नहीं रुकेंगे धारा 138 NI Act के चेक बाउंस मामले: सर्वोच्च न्यायालय

CB News Desk
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत दिवालियापन कार्यवाही शुरू होने के बावजूद NI Act की धारा 138 के तहत चल रहे चेक बाउंस केस स्वतः स्थगित नहीं होंगे। - दिनेशचंद सुराणा बनाम यूको बैंक

IBC के तहत व्यक्तिगत दिवालियापन का हवाला देकर नहीं रुकेंगे धारा 138 NI Act के चेक बाउंस मामले: सर्वोच्च न्यायालय

सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस मामलों और दिवाला कानून के बीच टकराव पर अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि व्यक्तिगत दिवालियापन (Personal Insolvency) की कार्यवाही शुरू होने मात्र से नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही स्वतः नहीं रुकेगी।

न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि चेक बाउंस का मामला केवल पैसे की वसूली तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य व्यापारिक लेन-देन में भरोसा बनाए रखना भी है।

यह फैसला दिनेशचंद सुराना द्वारा दायर अपीलों पर आया, जिन्होंने UCO बैंक के खिलाफ चल रही धारा 138 की कार्यवाही को रोकने की मांग की थी।

मामले की पृष्ठभूमि

रिकॉर्ड के अनुसार, सुराना पावर लिमिटेड ने इंडोनेशियाई कोयले की खरीद के लिए UCO बैंक से वित्तीय सुविधाएं ली थीं। बाद में कंपनी की ओर से जारी करीब ₹5 करोड़ का चेक “Funds Insufficient” टिप्पणी के साथ बाउंस हो गया।

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इसके बाद बैंक ने धारा 138 NI Act के तहत चेन्नई की मजिस्ट्रेट अदालत में शिकायत दायर की।

कई वर्षों बाद, कंपनी के पूर्व प्रबंध निदेशक दिनेशचंद सुराना ने IBC के Part III के तहत व्यक्तिगत दिवालियापन कार्यवाही शुरू होने का हवाला देते हुए कहा कि धारा 96 और 101 के तहत लागू मोरेटोरियम के कारण चेक बाउंस केस पर रोक लगनी चाहिए।

हालांकि मद्रास हाई कोर्ट ने 2023 में उनकी याचिका खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि धारा 138 की कार्यवाही केवल रिकवरी प्रोसीडिंग नहीं बल्कि आपराधिक प्रकृति की है। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने किन सवालों पर विचार किया

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान तीन मुख्य मुद्दों पर विचार किया-

क्या धारा 138 की कार्यवाही केवल धन वसूली की प्रक्रिया है?

क्या IBC के तहत मोरेटोरियम चेक बाउंस मामलों पर लागू होगा?

क्या कंपनी के निदेशक व्यक्तिगत दिवालियापन का हवाला देकर धारा 141 के तहत जिम्मेदारी से बच सकते हैं?

बेंच ने NI Act की धारा 138 की प्रकृति और उद्देश्य का विस्तार से विश्लेषण किया।

कोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चेक का अनादर (Dishonour) मूल रूप से एक सिविल लेन-देन से जुड़ा हो सकता है, लेकिन कानून ने इसे “deemed offence” यानी विधिक रूप से आपराधिक अपराध माना है।

बेंच ने कहा, “संसद ने चेक बाउंस को दंडनीय इसलिए बनाया ताकि लोग चेक का सम्मान करें और व्यापारिक लेन-देन में भरोसा बना रहे।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपराध केवल कर्ज न चुकाने का नहीं, बल्कि ऐसे चेक जारी करने का है जो भुगतान के समय बाउंस हो जाए।

साथ ही अदालत ने माना कि धारा 138 में क्षतिपूर्ति (compensatory) तत्व भी मौजूद है क्योंकि आरोपी को नोटिस मिलने के बाद भुगतान करने का अवसर दिया जाता है।

फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्णयों P. मोहनराज v. शाह Bros. Ispat Pvt. Ltd. और राकेश भनोट बनाम गुरदास एग्रो प्रा. लिमिटेड का भी उल्लेख किया गया।

सिविल रिकवरी और आपराधिक जिम्मेदारी में अंतर

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चेक बाउंस मामलों को केवल सिविल रिकवरी प्रोसीडिंग नहीं माना जा सकता।

अदालत के अनुसार, भले ही मामला किसी वित्तीय देनदारी से जुड़ा हो, लेकिन कानून ने जानबूझकर चेक के अनादर को दंडनीय बनाया है ताकि व्यापारिक प्रणाली की विश्वसनीयता बनी रहे।

बेंच ने कहा कि धारा 138 के तहत कार्रवाई का उद्देश्य केवल रकम की वसूली नहीं बल्कि वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करना भी है।

कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अंततः माना कि NI Act की धारा 138 के तहत चलने वाली कार्यवाही आपराधिक प्रकृति की है और व्यक्तिगत दिवालियापन के दौरान लागू IBC मोरेटोरियम से स्वतः प्रभावित नहीं होती।

अदालत ने कहा कि कंपनी के निदेशक या अन्य जिम्मेदार व्यक्ति केवल इस आधार पर चेक बाउंस मामले से राहत नहीं मांग सकते कि उनके खिलाफ दिवालियापन या दिवाला प्रक्रिया लंबित है।

इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपीलें खारिज कर दीं और चेक बाउंस मामलों की कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी।

Case Details

Case Title: Dineshchand Surana v. UCO Bank

Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 12135 of 2024

Judge: Justice J.B. Pardiwala and Justice K. V. Viswanathan

Decision Date: 27 May 2026

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