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लोक अदालत तलाक नहीं दे सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- DLSA का समझौता विवाह समाप्त नहीं करता

Shivam
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोक अदालत या डीएलएसए को तलाक देने का अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि पक्षकारों के बीच आज तक कोई वैध तलाक नहीं हुआ है। - सुषमा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य

लोक अदालत तलाक नहीं दे सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- DLSA का समझौता विवाह समाप्त नहीं करता

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि लोक अदालत या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को तलाक की डिक्री देने का अधिकार नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी समझौते या लोक अदालत की कार्यवाही को वैध तलाक नहीं माना जा सकता, जब तक सक्षम न्यायालय विधिवत तलाक की डिक्री पारित न करे।

न्यायमूर्ति शेखर बी. साराफ और न्यायमूर्ति अभधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह फैसला सुषमा देवी द्वारा दायर याचिका पर सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले में पति ने वर्ष 2018 में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, उन्नाव के समक्ष एक प्री-लिटिगेशन वाद दायर किया था। इसके बाद 12 जून 2018 को एक समझौता दर्ज किया गया और प्रकरण का निस्तारण कर दिया गया। पति का दावा था कि उक्त समझौते के आधार पर दोनों का आपसी सहमति से तलाक हो चुका था और इसी आधार पर उसने दूसरा विवाह भी कर लिया।

वहीं पत्नी ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि उससे धोखे से हस्ताक्षर कराए गए थे। उसका कहना था कि कथित समझौते के बाद भी दोनों पति-पत्नी की तरह साथ रहे और वर्ष 2019 में उनकी एक बेटी का जन्म भी हुआ। इसलिए समझौते को वैध तलाक नहीं माना जा सकता।

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हाईकोर्ट ने लोक अदालत और डीएलएसए की भूमिका का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने कहा कि विधिक सेवा प्राधिकरण से संबंधित नियमों के अनुसार तलाक जैसे मामलों को लोक अदालत में न तो भेजा जा सकता है और न ही लोक अदालत इस संबंध में कोई आदेश पारित कर सकती है।

पीठ ने कहा,

“लोक अदालत का कार्य केवल पक्षकारों को समझौते तक पहुंचाने में सहायता करना है। उसे विवाद का निर्णय देने या कोई आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक संबंध समाप्त करने का अधिकार केवल सक्षम पारिवारिक न्यायालय को है।

हाईकोर्ट ने इस मामले में डीएलएसए और लोक अदालत की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर चिंता जताई। अदालत ने पाया कि नोटिस जारी होने, मध्यस्थता के लिए भेजे जाने और समझौता होने की पूरी प्रक्रिया अत्यंत जल्दबाजी में पूरी की गई।

पीठ ने यह भी कहा कि समझौते की कुछ शर्तें कानून के विपरीत थीं। विशेष रूप से वह शर्त, जिसमें पक्षकारों को पुनर्विवाह के लिए स्वतंत्र बताया गया था। अदालत के अनुसार ऐसी शर्त तब तक प्रभावी नहीं हो सकती जब तक किसी सक्षम न्यायालय द्वारा विधिवत तलाक की डिक्री पारित न कर दी जाए।

अदालत ने कहा कि लोक अदालत द्वारा पारित आदेश अत्यंत संक्षिप्त और यांत्रिक प्रतीत होते हैं तथा उनमें आवश्यक कानूनी जांच का अभाव था।

याचिका का निस्तारण करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि याचिकाकर्ता और उसके पति के बीच आज तक कोई वैध तलाक नहीं हुआ है। अदालत ने माना कि डीएलएसए के समक्ष हुआ समझौता और उससे संबंधित आदेश तलाक की डिक्री के रूप में मान्य नहीं हैं।

पीठ ने कहा कि पति द्वारा यह दावा करना कि लोक अदालत के आदेश से तलाक हो गया था,

“कानून में किसी आधार या वैधता से समर्थित नहीं है।”

अदालत ने याचिकाकर्ता को कानून के अनुसार उचित कार्यवाही करने की स्वतंत्रता दी और आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के सभी लोक अदालतों एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को भविष्य के मार्गदर्शन और अनुपालन हेतु प्रेषित करने का निर्देश दिया।

Case Details:

Case Title: Smt. Sushma Devi v. State of U.P. Through Principal Secretary, Department of Law & Others

Case Number: Writ-C No. 12174 of 2025

Judges: Justice Shekhar B. Saraf and Justice Abdhesh Kumar Chaudhary

Decision Date: April 30, 2026

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