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मानव तस्करी पीड़ितों को पुनर्वास का मौलिक अधिकार, सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया देशव्यापी विक्टिम प्रोटेक्शन प्लान

CB News Desk

सर्वोच्च न्यायालय ने व्यावसायिक यौन शोषण के लिए मानव तस्करी के पीड़ितों को पुनर्वास का संवैधानिक अधिकार दिया और उनकी सुरक्षा एवं पुनर्वास के लिए विस्तृत राष्ट्रव्यापी दिशानिर्देश जारी किए। - प्रज्वला बनाम भारत संघ और अन्य

मानव तस्करी पीड़ितों को पुनर्वास का मौलिक अधिकार, सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया देशव्यापी विक्टिम प्रोटेक्शन प्लान
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सुप्रीम कोर्ट ने मानव तस्करी और व्यावसायिक यौन शोषण (Commercial Sexual Exploitation) के मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि ऐसे पीड़ितों को केवल बचाया जाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें सम्मानजनक जीवन के लिए प्रभावी पुनर्वास (Rehabilitation) भी उपलब्ध कराना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है। अदालत ने माना कि तस्करी के शिकार लोगों का पुनर्वास का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 और 23 से जुड़ा हुआ है।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने इस मामले में एक विस्तृत "विक्टिम प्रोटेक्शन प्लान" भी तैयार किया, जो देशभर में पीड़ितों के बचाव, सुरक्षा, पुनर्वास और पुनर्समावेशन के लिए मार्गदर्शक दस्तावेज के रूप में काम करेगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 2004 में मानव तस्करी के खिलाफ काम करने वाली संस्था ‘प्रज्वला’ द्वारा दायर याचिका से शुरू हुआ था। संस्था ने अदालत को बताया था कि तस्करी और यौन शोषण से मुक्त कराए गए महिलाओं और बच्चों को बचाव के बाद पर्याप्त सुरक्षा, पुनर्वास और सामाजिक पुनर्स्थापन नहीं मिल पाता है।

याचिका में कहा गया था कि कई बार पीड़ितों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाता है और प्रभावी पुनर्वास व्यवस्था के अभाव में वे दोबारा शोषण और तस्करी के चक्र में फंस जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में केंद्र सरकार के कुछ आश्वासनों को रिकॉर्ड पर लेते हुए मूल याचिका का निस्तारण कर दिया था। बाद में प्रज्वला ने आरोप लगाया कि सरकार द्वारा किए गए महत्वपूर्ण वादों को लागू नहीं किया गया, जिसके बाद मामला फिर अदालत के सामने आया।

अदालत की टिप्पणी

पीठ ने मौजूदा कानूनों और सरकारी योजनाओं की समीक्षा करते हुए पाया कि पीड़ितों के संरक्षण और पुनर्वास के लिए अब भी एक समग्र और स्पष्ट व्यवस्था का अभाव है।

अदालत ने कहा कि वर्तमान कानूनी ढांचे में ऐसा कोई व्यापक प्रोटोकॉल नहीं है जो यह निर्धारित करे कि बचाव अभियान के दौरान और उसके बाद पीड़ितों के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया जाए तथा उनके पुनर्वास को कैसे सुनिश्चित किया जाए।

पीठ ने कहा कि पुनर्वास केवल आश्रय गृह उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं हो सकता। इसमें चिकित्सा सुविधा, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, शिक्षा, कौशल विकास, आर्थिक आत्मनिर्भरता और समाज में सम्मानजनक पुनर्स्थापन भी शामिल है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुनर्वास की प्रक्रिया पीड़ित की इच्छा, पसंद और परिस्थितियों को केंद्र में रखकर संचालित की जानी चाहिए, ताकि उसकी गरिमा और स्वायत्तता सुरक्षित रह सके।

विक्टिम प्रोटेक्शन प्लान पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश

मौजूदा व्यवस्था में खामियां पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 32 और 142 के तहत विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए।

यह विक्टिम प्रोटेक्शन प्लान निम्न चरणों को कवर करता है:

बचाव अभियान से पहले की तैयारी;

बचाव प्रक्रिया;

बचाव के बाद कानूनी और सामाजिक सहायता;

सुरक्षित आश्रय और संरक्षण;

पुनर्वास एवं पुनर्समावेशन;

पीड़ितों की गोपनीयता की रक्षा;

पुलिस और अन्य संबंधित अधिकारियों का प्रशिक्षण।

अदालत ने यह भी कहा कि संरक्षण गृह किसी जेल या लॉक-अप जैसे नहीं होने चाहिए। वहां रहने वाले पीड़ितों के लिए स्वच्छ वातावरण, चिकित्सा सुविधा, परामर्श सेवाएं और गरिमापूर्ण जीवन की व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए।

केंद्र और राज्यों को निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मान्यता प्राप्त कल्याणकारी संस्थाओं को अधिसूचित करने, सामाजिक कार्यकर्ताओं की सूची तैयार करने तथा मानव तस्करी से जुड़े मामलों के लिए वरिष्ठ स्तर के नोडल अधिकारियों की नियुक्ति करने का निर्देश दिया।

अदालत ने केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर इन निर्देशों के पालन को सुनिश्चित करने का आदेश दिया और अनुपालन रिपोर्ट की समीक्षा के लिए मामले को सितंबर 2026 में सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि व्यावसायिक यौन शोषण के लिए मानव तस्करी के शिकार लोगों को पुनर्वास का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। अदालत ने पाया कि मौजूदा व्यवस्था में गंभीर कमियां हैं, इसलिए पीड़ितों की गरिमा, सुरक्षा और पुनर्वास सुनिश्चित करने के लिए एक विस्तृत राष्ट्रीय विक्टिम प्रोटेक्शन प्लान लागू किया जाना आवश्यक है।

इसके साथ ही अदालत ने मामले का निस्तारण कर दिया।

Case Details

Case Title: Prajwala v. Union of India & Others

Case Number: Miscellaneous Application No. 530 of 2022 in Writ Petition (Civil) No. 56 of 2004

Judges: Justice J.B. Pardiwala and Justice R. Mahadevan

Decision Date: 29 May 2026

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